बीजापुर के नक्सल प्रभावित बेदरे इलाके में तैनात जवानों को मोबाइल नेटवर्क न होने के कारण अपने परिवार और अपनों से संपर्क करने में काफी समस्या का सामना करना पड़ रहा है. इससे जवान और उनके परिजन दोनों ही तनाव में हैं, जो उनकी ड्यूटी के साथ-साथ मेंटल स्थिति को प्रभावित कर रहा है.
नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में तैनात जवानों की जंग सिर्फ हथियारों और जंगल तक सीमित नहीं है. यह जंग उनके मानसिक और भावनात्मक संघर्ष से भी जुड़ी है. छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के सबसे अंतिम छोर, बेदरे में तैनात जवान इस बात का रोज सामना कर रहे हैं कि मोबाइल नेटवर्क न होने के कारण वे अपने परिवार और अपनों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं. नतीजतन, खबर लेने और देने दोनों में ही परेशानी होती है, जिससे जवान और उनके परिजन दोनों ही तनाव में रहते हैं.
मोबाइल नेटवर्क की कमी
जवानों की दिनचर्या में मोबाइल नेटवर्क की कमी ने एक नया चुनौतीपूर्ण आयाम जोड़ दिया है. अपनों से संपर्क करने की उम्मीद में जवान अक्सर पेड़ों और ऊंचे स्थानों पर चढ़कर सिग्नल तलाशते दिखाई देते हैं. नेटवर्क की कमी न केवल उनका मनोबल प्रभावित करती है बल्कि परिवार की चिंता भी बढ़ाती है. परिजनों की ओर से लगातार संदेश और कॉल का इंतजार जवानों के लिए एक मेंटल प्रेशर बन जाता है. हालांकि, बीते डेढ़ साल में नक्सल प्रभावित इलाकों में मोबाइल नेटवर्क का विस्तार काफी हद तक हुआ है. इसके बावजूद, बेदरे जैसे अंतिम छोरों में नेटवर्क की अनुपस्थिति जवानों और उनके परिवारों के लिए चुनौती बनी हुई है. जवानों के मुताबिक, जल्द ही मोबाइल टावर लगने से वे अपने अपनों से नियमित संपर्क कर सकेंगे और इस कठिन परिस्थिति में थोड़ा सुकून मिलेगा.
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में ड्यूटी
यह स्थिति यह साफ करती है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जवानों की सेवा केवल ड्यूटी तक सीमित नहीं है. उनके लिए परिवार से संपर्क, मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा की समस्याएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी कि मैदान में लड़ाई. नेटवर्क की कमी ने उनके संघर्ष को और जटिल बना दिया है और उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही तकनीकी सुधार के माध्यम से जवानों और उनके परिवारों की चिंताओं को कम किया जाएगा.



