झीरम घाटी हमले की जांच से जुड़े अदालती रिकॉर्ड में 25 मई 2013 की उस भयावह घटना से पहले और बाद के कई ऐसे विवरण सामने आए हैं, जो उस दिन की घटनाओं की कड़ियों को जोड़ने की कोशिश करते हैं।
इसी क्रम में नंदकुमार पटेल के वाहन चालक की गवाही में कांग्रेस नेता कवासी लखमा से जुड़ा एक मामला दर्ज है।
ड्राइवर के मुताबिक हमले के दौरान और उससे पहले लखमा के पास बार-बार फोन आ रहे थे और वे गोंडी भाषा में बातचीत कर रहे थे। अदालती रिकॉर्ड में दर्ज गवाही के अनुसार परिवर्तन यात्रा के दौरान कवासी लखमा नंदकुमार पटेल के वाहन में सवार थे।
रास्ते में लखमा के मोबाइल पर कई बार कॉल आए। गवाह ने बताया कि इन कॉल के दौरान गोंडी भाषा में बातचीत होती थी। बातचीत में बार-बार 10-15 शब्द सुनाई देने की बात गवाही में कही गई है।
गवाही में आगे बताया गया है कि जब नंदकुमार पटेल ने लखमा से हिंदी में बात करने और बातचीत का मतलब बताने को कहा, तो लखमा की ओर से डीजल-डीजल कहे जाने का उल्लेख है। यह पूरा प्रसंग अभियोजन पक्ष के गवाह की गवाही का हिस्सा है।
अदालत के फैसले में इस तथ्य का उल्लेख होना और अदालत द्वारा इसे किसी अलग निष्कर्ष के रूप में स्वीकार करना दो अलग बातें हैं। कॉल आने और गोंडी भाषा में बात करने को साजिश का हिस्सा नहीं मन गया। घायल के तौर पर गवाही में शामिल हुए लखमा ने बताया कि नक्सलियों ने नंदकुमार पटेल और उनका नाम पूछा और ड्राइवर और उनको जाने दिया।
अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक झीरम घाटी में विस्फोट और गोलीबारी के बाद माओवादी नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश, वाहन चालक दशाराम सिदार और कवासी लखमा को घने जंगल की ओर ले गए थे। वहां माओवादियों ने उनकी पहचान पूछी।
नंदकुमार पटेल ने खुद को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बताया। इसके बाद उन्हें और उनके बेटे को बांध दिया गया। रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि बाद में लखमा और वाहन चालक को वहां से जाने के लिए कहा गया।
गवाह ने घटनास्थल पर कवासी लखमा और माओवादी नेता बताए गए विनोद के बीच गोंडी भाषा में बातचीत होने की बात भी कही। इस बातचीत के बाद घटनास्थल की परिस्थितियां और बदल गईं। अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, करीब एक घंटे बाद नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश को पीछे से गोली मार दी गई। इसके बाद लखमा और वाहन चालक मोटरसाइकिल से दरभा थाने पहुंचे।
झीरम घाटी में 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर माओवादी हमला हुआ था। इस हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, महेंद्र कर्मा और विद्याचरण शुक्ल समेत कई लोगों की मौत हुई थी। NIA के रिकॉर्ड के अनुसार हमले में 27 लोगों की मौत हुई और 38 लोग घायल हुए थे।
अब करीब 13 साल बाद विशेष NIA अदालत के फैसले में दर्ज गवाहियों और साक्ष्यों के सामने आने से उस दिन की घटनाओं के कई पहलुओं पर फिर चर्चा शुरू हुई है।
झीरम मामले के करीब 185 पन्नों के फैसले में अदालत ने घटनास्थल के फोरेंसिक साक्ष्य, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, बैलिस्टिक जांच और गवाहियों को भी परखा। फैसले में घटनास्थल से जुड़े साक्ष्यों और बड़ी संख्या में चली गोलियों का उल्लेख है।
हालांकि, लखमा के फोन, गोंडी बातचीत और 10-15 और डीजल-डीजल वाले प्रसंग को लेकर यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह गवाह के बयान का हिस्सा है। इसे अपने आप में किसी व्यक्ति की भूमिका या किसी साजिश का निर्णायक प्रमाण मानना अदालत के निष्कर्ष से अलग बात होगी।
झीरम हमले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया में यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण रहे हैं कि उपलब्ध गवाहियों, वैज्ञानिक साक्ष्यों और परिस्थितिजन्य तथ्यों को किस तरह एक-दूसरे से जोड़ा जाए। विशेष अदालत के फैसले के बाद भी इस मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया जारी रह सकती है।



