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ये है हिंदुस्तान की सबसे अनोखी जेल, यहां कैदियों के साथ किया ऐसा काम

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पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड के दीमापुर में बनी जेल का दृश्य सबसे अनोखा है। दरअसल यहां कैदियों के लिए सप्ताह में दो बार क्लास लगाई जाती है। अलेमला लॉन्गचार, तीन वकीलों और एक एनजीओ की मदद से सप्ताह में दो बार कैदियों को पढ़ाया जाता है, कई कैदियों को साक्षर बनने और किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। लगभग 80 कैदियों वाली इस जेल में लगभग 200 पुस्तकों और पत्रिकाओं वाला एक छोटा पुस्तकालय है। पुस्तकालय की स्थापना पिछले साल दिल्ली स्थित एनजीओ सर्वहिताय द्वारा की गई थी। एनजीओ के ट्रस्टी प्रेम प्रकाश ने बताया कि हम दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहरों में लोगों से सेकंड-हैंड किताबें इकट्ठा करते हैं और सिक्किम, झारखंड, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश जैसे दूर-दराज के इलाकों में लाइब्रेरी स्थापित करते हैं, जहां लोगों की पहुंच नहीं है।

दीमापुर की जेल की इस लाइब्रेरी में पहले कोई कैदी पढ़ने नहीं आता था। लॉन्गचार के हफ्ते में दो बार यहां पढ़ाने आने से कैदी अब पढ़ने में रुचि लेने लगे हैं। इस मुहिम से जुड़े लिमसेनला लॉन्गकुमेर ने बताया कि अब यहां शिक्षित कैदियों ने मोर्चा संभाल लिया है और वे अपने साथी कैदियों को पढ़ाने लगे हैं। इस परियोजना की सफलता ने अधिकारियों का भी ध्यान खींचा है। अब मुहिम में शामिल लोगों को नगालैंड के मोन और मिजोरम जिले की जेल में भी ऐसी लाइब्रेरी स्थापित करने का अनुरोध हुआ है।

कविता के बाद, लॉन्गचार कैदियों को स्थानीय भाषा में दंतकथाएं सुनाती हैं। उनके कहानी सुनाने के तरीके को सब एंजॉय करते हैं। कभी गंभीर हो जाते हैं तो कभी जोर-जोर से ठहाके लगाते हैं। लॉन्गचार कैदियों से उनकी पसंद की किताब या उन्हें किस किताब की जरूरत है उसके बारे में पूछती हैं और फिर उन्हें आर्ट, संगीत, कला संबंधित हर किताब लाकर देती हैं। पढ़ाने का सत्र लॉन्गचार द्वारा धन्यवाद प्रार्थना के साथ खत्म होता है।

जेलर युसुफी शरू ने कहा कि जेल में इस योजना के शुरू होने के बाद से कैदियों में सकारात्मक व्यवहार का परिवर्तन देख रहा है। लॉन्गचार पुस्तकालय को ‘रेगिस्तान में सागर’ कहती हैं। वह कहती हैं कि यह सिर्फ एक पुस्तकालय नहीं है बल्कि काउंसलिंग का कमरा भी है। वह कहती हैं कि जब उन्हें पता चला कि कुछ एचआईवी पॉजिटिव कैदियों के साथ साथी कैदियों का व्यवहार अच्छा नहीं है तो कैदियों के लिए विशेष सत्र का आयोजन किया गया और उनकी एचआईवी-एड्स से जुड़े भ्रम की काउंसलिंग की गई। लाइब्रेरी चलाने की जिम्मेदारी अखाम नाम के एक कैदी की है। वह कहते हैं कि रोज आठ से नौ लोग आते हैं और किताबें देते हैं।