भारत अपने गणतंत्र दिवस के अवसर पर लगभग हर साल किसी न किसी देश के शासनाध्यक्ष या राजनेता को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करता रहा है। यह आमंत्रण दो देशों या समूहों के बीच कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण साधन के रूप में इस्तेमाल होते रहे हैं, लेकिन ऐसा भी हुआ है कि इस समारोह में पड़ोसी और धुर-प्रतिद्वंद्वी देश पाकिस्तान के राजनेताओं को दो बार आमंत्रित किया है।
अपने पांचवें गणतंत्र दिवस (1955) में भारत ने पहली बार अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था। यह आज के कटु संबंधों को देखते हुए एक असंभव सी बात लगती है, लेकिन तब भी रिश्तों में कोई बहुत मिठास नहीं थी, हालांकि तब इतनी खटास भी नहीं थी।
दोनों नवनिर्मित देश अपनी-अपनी समस्याओं से तो जूझ ही रहे थे, लेकिन अपने संबंधों को लेकर भी जूझ रहे थे, ऐसे में भारत ने मलिक गुलाम मोहम्मद को आमंत्रित कर एक उदार और साहसी कदम उठाया था। मलिक गुलाम मोहम्मद ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी और हैदराबाद निजाम के लिए वित्तीय सलाहकार के रूप में काम किया था। तब दोनों देशों के आकार लेते रिश्तों की पृष्ठभूमि में भारत यह उम्मीद कर रहा था कि मोहम्मद के भारत से व्यक्तिगत जुड़ाव का दोनों देशों के संबंधों को सकारात्मक लाभ होगा।
स्थितियों में लेकिन बहुत सुधार नहीं हुआ, परंतु भारत ने एक बार और उदार कदम उठाते हुए एक दशक बाद फिर से पाकिस्तान के एक अन्य प्रमुख राजनेता को आमंत्रित किया। पाकिस्तान के तत्कालीन कृषि एवं खाद्य मंत्री राना अब्दुल हामिद 15वें गणतंत्र दिवस में मुख्य अतिथि बने। यह विडंबना ही है कि यह साल 1965 था। मात्र तीन महीने बाद दोनों देशों के बीच युद्ध शुरू हो गया और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक प्रयास के रूप चल रहा आमंत्रण का यह सिलसिला यहीं थम गया।
आज जब भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, यूरोपीय संघ के दो शीर्ष नेताओं एंटोनियो कोस्टा एवं उर्सुला वॉन डेर लेयेन को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। इस समय दोनों (भारत और ईयू) एक महत्वपूर्ण आर्थिक समझौते को पूरा करने के काफी नजदीक हैं, लेकिन वहीं दो पड़ोसी देश (भारत और पाकिस्तान) कटु संबंधों के दौर से गुजर रहे हैं।



