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कड़कनाथ मुर्गा जीता लंबी लड़ाई, मिला GI टैग

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नई दिल्ली. कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस को जीआई टैग मिल गया है. यह लंबी लड़ाई के बाद प्राप्त हो पाया है. कड़कनाथ मुर्गे को स्थानीय जुबान में कालामासी कहा जाता है. इसकी त्वचा और पंखों से लेकर मांस तक का रंग काला होता है और इसमें अधिक मात्रा में प्रोटीन के साथ ही औषधीय गुण भी होते हैं. देश की जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री ने मध्यप्रदेश के झाबुआ की पारंपरिक प्रजाति के कड़कनाथ मुर्गे को लेकर सूबे के दावे पर मंजूरी की मुहर लगा दी है. करीब साढ़े छह साल की लम्बी जद्दोजहद के बाद झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस के नाम को भौगोलिक पहचान (जीआई) का चिन्ह रजिस्टर्ड किया गया है.

इस निशान के लिए सहकारी सोसाइटी कृषक भारती को-ऑपरेटिव लिमिटेड (कृभको) के स्थापित संगठन ग्रामीण विकास ट्रस्ट के झाबुआ स्थित केंद्र ने आवेदन किया था. जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मांस उत्पाद और पोल्ट्री एवं पोल्ट्री मीट की श्रेणी में किये गये इस आवेदन को 30 जुलाई को मंजूर कर लिया गया है. यानी झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस का नाम जीआई टैग के लिए रजिस्टर्ड हो गया है. यह जीआई रजिस्ट्रेशन सात फरवरी 2022 तक वैध रहेगा.

ग्रामीण विकास ट्रस्ट के क्षेत्रीय कार्यक्रम प्रबंधक महेंद्र सिंह राठौर ने इसकी पुष्टि की है. उन्होंने बताया, हमारी अर्जी पर झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस के नाम को जीआई चिन्ह का रजिस्ट्रेशन हो गया है. हमें इसकी औपचारिक सूचना मिल चुकी है.

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