कभी नक्सलियों की वजह से बदनाम रहे छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में अब पर्यटकों की आमद बढ़ने लगी है। नक्सल हिंसा में आई कमी और सीआरपीएफ की तैनाती का असर पर्यटन व्यवसाय पर दिखने लगा है। बस्तर में चित्रकोट, तीरथगढ़ जैसे विश्वविख्यात जलप्रपात हैं। वहीं कोटमसर की गुफाएं दशकों से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहीं, लेकिन बस्तर का बहुत बड़ा हिस्सा अब तक लोगों से अछूता रहा।
साउथ बस्तर के जंगलों में 11 खूबसूरत झरने हैं, जिनमें से ज्यादातर दुनिया की नजरों में नहीं आ पाए हैं। सातधार पुल जहां नक्सल दहशत के चलते पर्यटक ही नहीं, स्थानीय लोगों ने भी जाना बंद कर दिया था, सीआरपीएफ कैंप बन जाने के बाद पर्यटकों से फिर गुलजार हो गया है।
दंतेवाड़ा के निकट फूलपाड़ जलप्रपात तक स्थानीय लोग ही पहुंच पाते हैं। सातधार जलप्रपात को बस्तर का भेड़ाघाट कहते हैं। अबूझमाड़ में तो पहाड़ों और झरनों की पूरी श्रृंखला मौजूद है। दिक्कत सिर्फ नक्सली रहे, जो अब बैकफुट पर हैं। बीते तीन वर्षों में केंद्रीय अर्धसैन्य बलों खासकर सीआरपीएफ की पहुंच सुदूर इलाकों तक हुई है। पुरातात्विक धरोहरों के लिए प्रसिद्ध बारसूर में इंद्रावती नदी सात धाराओं में बंटकर बहती है।
यहां सातधार में पुल है, जिसके उसपार अबूझमाड़ का इलाका शुरू होता है। पहले नक्सलियों की राजधानी माने जाने वाले इस इलाके में जाने से लोग कतराते थे, लेकिन लोगों की आवाजाही बढ़ी है। इसी इलाके में हांदावाड़ा जलप्रपात है। यहां तक पैदल ही जाया जा सकता है।
साल-दर-साल बढ़ रहे पर्यटक
कभी व्यस्त पिकनिक स्पॉट रहा सातधार का पुल नक्सल घटनाओं की वजह से यहां लोगों ने आना बंद कर दिया था। लेकिन सीआरपीएफ की तैनाती के बाद से आंकड़े बढ़े हैं। इसके मुताबिक जून 2018 से जून 2019 तक सातार पुल पर दोपहिया वाहनों की संख्या में 77 फीसद बढ़ोतरी हुई है। सीआरपीएफ ने कुछ पर्यटकों के वीडियो भी जारी किए हैं, जिनमें वे बस्तर के नैसर्गिक सौंदर्य से अभिभूत दिख रहे हैं।
गांवों से निकल रहे आदिवासी
नक्सल दबाव की वजह से गांवों से निकलने में परहेज करने वाले आदिवासी अब सातधार के पुल तक ड़ल्ले से आवाजाही कर रहे हैं। पिकअप, कमांडर जीप जैसे वाहनों की संख्या में 36 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। मालेवाही, हर्राकोडेर, मंगनार आदि गांवों में वाहनों की आमदरफ्त तेजी से बढ़ रही है। सीआरपीएफ अब इस इलाके में पर्यटकों की सुविधा के लिए काम करने की योजना बना रही है।



