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भारतीय न्यायपालिका के शीर्ष प्रशासनिक और न्यायिक ढांचे में उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के पद रिक्त होना एक महत्वपूर्ण विषय…

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भारतीय न्यायपालिका के शीर्ष प्रशासनिक और न्यायिक ढांचे में उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के पद रिक्त होना एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है.

वर्तमान समय में देश के कुल 25 उच्च न्यायालयों में से सात प्रमुख अदालतें बिना किसी नियमित मुख्य न्यायाधीश के काम कर रही हैं.

न्यायिक कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम ने चार जजों को पदोन्नत कर विभिन्न उच्च न्यायालयों का चीफ जस्टिस बनाने की महत्वपूर्ण सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई में हुई कॉलेजियम की इस बैठक से न्यायिक व्यवस्था को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है. चलिए जानें कि किन हाईकोर्ट में रेगुलर चीफ जस्टिस नहीं हैं.

किन चार हाईकोर्ट के लिए कॉलेजियम की सिफारिश?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में बीते 6 अगस्त को हुई सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की महत्वपूर्ण बैठक में चार हाईकोर्ट्स के लिए जजों के नामों को मंजूरी दी गई. सिफारिशों के अनुसार दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस वी. कमलेश्वर राव को पटना हाईकोर्ट का नया मुख्य न्यायाधीश बनाने का प्रस्ताव रखा गया है. वहीं बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस रवींद्र वी. घुगे को कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पद के लिए चुना गया है.

बॉम्बे और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के लिए सीजे के नाम

कॉलेजियम ने सिफारिशों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी को बॉम्बे हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त करने का सुझाव दिया है. इसके साथ ही पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में कार्यरत जज जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा को उसी हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने की बात कही गई है. इन चार नामों पर सरकार की अंतिम मुहर और अधिसूचना का इंतजार किया जा रहा है.

किन तीन उच्च न्यायालयों पर फैसला अभी बाकी?

देश की न्यायपालिका में कुल 7 अदालतें स्थाई प्रमुख के बिना चल रही हैं, जिनमें से 4 पर कॉलेजियम ने फैसला ले लिया है. हालांकि राजस्थान, जम्मू-कश्मीर और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के लिए अभी तक नाम तय नहीं किए जा सके हैं. इन तीनों अदालतों में फिलहाल कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की व्यवस्था लागू है. राजस्थान में जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा, जम्मू-कश्मीर में जस्टिस संजीव कुमार और मध्य प्रदेश में जस्टिस विवेक रूसिया कार्यवाहक चीफ जस्टिस का पदभार संभाल रहे हैं.

क्या होते हैं कार्यवाहक चीफ जस्टिस?

जब किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद खाली होता है या वे अवकाश अथवा बीमारी के कारण काम करने में असमर्थ होते हैं, तब कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की जाती है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 223 के तहत देश के राष्ट्रपति को यह संवैधानिक अधिकार प्राप्त है कि वे संबंधित हाईकोर्ट के किसी वरिष्ठ और योग्य जज को अंतरिम तौर पर यह जिम्मेदारी सौंप सकें. यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि मुख्य अदालत के दैनिक न्यायिक और प्रशासनिक कार्य रुके बिना चलते रहें.

नियमित चीफ जस्टिस की नियुक्ति

हाईकोर्ट के नियमित यानी स्थाई चीफ जस्टिस की नियुक्ति एक विस्तृत संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होती है. सबसे पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाला सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम उपयुक्त जजों के नाम तय करके केंद्र सरकार को भेजता है. इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा केंद्र सरकार की सलाह पर नई नियुक्ति की आधिकारिक अधिसूचना जारी की जाती है. शपथ ग्रहण के बाद नियमित मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यकाल के दौरान अदालत के पूर्णकालिक प्रमुख के रूप में जिम्मेदारी संभालते हैं.

शक्तियों में समानता और कार्यशैली में क्या अंतर?

संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार कार्यवाहक और नियमित चीफ जस्टिस के पास समान प्रशासनिक और न्यायिक अधिकार होते हैं. अनुच्छेद 223 के तहत नियुक्त कार्यवाहक चीफ जस्टिस भी मुकदमों के लिए बेंचों का गठन करते हैं और बड़े मामलों की सुनवाई का नेतृत्व करते हैं. हालांकि, दोनों के काम करने के तरीके में थोड़ा व्यावहारिक अंतर होता है. कार्यवाहक प्रमुख अपने छोटे और अस्थायी कार्यकाल के कारण दीर्घकालिक नीतिगत निर्णयों या बड़े प्रशासनिक बदलावों से बचते हैं और रोजमर्रा के जरूरी अदालती कार्यों पर ध्यान केंद्रित करते हैं.