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Crude oil: क्रूड ऑयल की कीमत कम होगी! 80 डॉलर तक आएगा भाव, बड़ी भविष्यवाणी…

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अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की खबर भर से ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल की कीमत गिरकर 83 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई. इससे पेट्रोल-डीजल के दाम घटने के कयास लगाए जाने लगे.

अमेरिका-ईरान के बीच युद्धविराम को लेकर शांति समझौते और होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) के खुलने की खबर से बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड फिसलकर 83 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गया है. इसी तरह से अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड भी 81 डॉलर के करीब कारोबार कर रहा है.

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी दरमियान दो ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म मॉर्गन स्टेनली (Morgan Stanley) और गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने क्रूड ऑयल की कीमतों को लेकर अपने अनुमान को कम करते हुए इसे 80 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है. अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम शांति समझौता अगले शुक्रवार (19 जून) को स्विटजरलैंड में साइन होने वाला है. इस बीच, होर्मुज से होकर जहाजों का आवाजाही शुरू होने के बाद इन दोनों बड़ी वित्तीय संस्थानों ने क्रूड ऑयल की कीमतों को लेकर अपनी रिपोर्ट जारी की हैं.

अब चूंकि दोनों के बीच शांति समझौता होने जा रहा है, जिससे वैश्विक स्तर पर गैस और तेल की सप्लाई होर्मुज से होकर दोबारा से सामान्य होगी. इस पर अमेरिका और ईरान दोनों की लंबे समय से लगाई गई नाकेबंदी भी हटा ली जाएंगी, तो दुनिया भर में एनर्जी सप्लाई को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता पर भी विराम लग जाएगा. इसी के चलते इन बैंकों ने अपने पुराने अनुमानों में भारी कटौती की है.

गोल्डमैन सैक्स का क्या है रुख?

गोल्डमैन सैक्स ने कारोबारी साल 2026 की चौथी तिमाही के लिए ब्रेंट क्रूड के अपने अनुमान को पहले के 90 डॉलर प्रति बैरल से घटाकर अब 80 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है. इसके साथ ही इसने 2027 के लिए भी अपने औसत अनुमान को 80 डॉलर प्रति बैरल से घटाते हुए 75 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है.

मॉर्गन स्टेनली ने क्या कहा?

मॉर्गन स्टेनली ने भी अपनी रिपोर्ट में चौथी तिमाही (Q4) के लिए ब्रेंड क्रूड को लेकर अपने अनुमान को 15 डॉलर घटाकर सीधे 80 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है, जो युद्ध और अनिश्चितता की स्थिति के दरमियान पहले 95 डॉलर प्रति बैरल था. इसके तीसरी तिमाही (Q3) के लिए अनुमान को 100 डॉलर प्रति बैरल से 10 डॉलर कम करते हुए 90 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है.

भारत के लिए ये अनुमान क्यों अहम?

भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. ऐसे में अगर कच्चा तेल गिरकर 80 डॉलर प्रति बैरल तक आ जाएगा, तो इससे भारत के आयात बिल में कमी आएगी. भारत विदेशों से खरीदे गए कच्चे तेल के भुगतान के लिए बड़े पैमाने पर अपने विदेशी भंडार से डॉलर खर्च करता है. इससे रुपये पर दबाव बढ़ता, महंगाई आसमान छूने लगती है और चालू खाता घाटा भी बढ़ने लगता है.

बीते कुछ दिनों से कच्चे तेल की कीमत में हुई बढ़ोतरी का ही नतीजा है कि देश में पेट्रोल-डीजल के दाम अब तक लगभग 7.50 रुपये तक बढ़ चुके हैं. इसके चलते लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन पर खर्च बढ़ा है, प्रोडक्शन कॉस्ट में इजाफा हुआ है. नतीजतन, कई चीजों के दाम बढ़ गए हैं.