छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल मुक्त अभियान के बाद डी माइनिंग, विकास और सरेंडर नक्सलियों के पुनर्वास पर तेज काम हो रहा है.
नक्सल मुक्त भारत के ऐलान के बाद छत्तीसगढ़ के बस्तर की तस्वीर बदल रही है. कभी गोलियों की आवाज से थर्राता बस्तर आज विकास के रास्ते पर दौड़ लगा रहा है. बस्तर के विकास का महा-प्लान लागू हो चुका है और अब यहां तेजी से काम शुरू हो गया है. बस्तर अगले 5 साल में देश के हर हिस्से की बराबरी कर लेगा.
बस्तर के सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर के कोने-कोने में डी माइनिंग अभियान चलाया जा रहा है. डी माइनिंग यानी वह प्रक्रिया जिसमें माइंस को जिसमें जमीन के नीचे दबे हुए विस्फोटकों को योजनाबद्ध तरीके से बस्तर के जंगलों से निकाला जा रहा है.
ये हैं इस अभियान के साइलेंट हीरो
नक्सली मुक्त भारत की घोषणा हो चुकी है लेकिन उसके पीछे उन साइलेंट हीरो का नाम है जिन्होंने अपनी जुगत आइडिया और काम करने के अनोखे अंदाज से नक्सलियों के गढ़ में अपनी पकड़ बनाई. उसके बाद नक्सलियों से संवाद कायम किया फिर उनको सरेंडर करने के लिए प्रेरित किया.
छत्तीसगढ़ पुलिस डीआरजी की महिला जवानों ने कुछ इस तरीके का कर्तव्य दिखाया और देश के सामने एक बहुत बड़ी मिसाल पेश की कि अगर पुलिस अपने काम करने के तरीके में नयापन और अपनापन लाती है तो बड़ी से बड़ी दिक्कत हल हो जाती है. आइए जानते हैं कि उन्हीं के अंदाज में छत्तीसगढ़ डीआरजी की महिला जवानों ने कैसे दी मात?
छत्तीसगढ़ की स्थानीय भाषा गोंड में यह महिलाएं जो कि छत्तीसगढ़ पुलिस डीआरजी में तैनात हैं वह इस तरीके से गाना गाकर अपनी खुशी व्यक्त कर रही हैं.
यह सुकमा इलाका है जो की दुर्दांत नक्सली हिडमा का गढ़ हुआ करता था. वो इसलिए खतरनाक था क्योंकि जितने भी बड़े हमले पिछले कुछ सालों में हुए थे इसकी प्लानिंग हिडमा ने ही की थी.
करीब तीन-चार साल पहले इन महिलाओं की भर्ती छत्तीसगढ़ पुलिस में हुई थी हिड़मा का आतंक चरम में था फिर इन्होंने अपने हिसाब से एक स्ट्रेटजी बनाई और उस पर काम करना शुरू किया. यह प्लान था गोंड भाषा में अंदरूनी इलाकों में आदिवासियों से संवाद करना और यही से यह नक्सलियों को प्रेरित करने सरेंडर करने में और खासकर दुर्दांत महिला नक्सली कमांडर को मुख्य धारा में लाने का काम पूरा हुआ. पिछले कुछ सालों में करीब 3000 नक्सलियों ने इसी स्ट्रेटजी के तहत सरेंडर किया है.
जाहिर सी बात है कि जब सफलता मिलती है तो चेहरे पर खुशी भी झलकती है और अब नक्सल मुक्त होने के बाद इस अंदाज में डीआरजी की यह महिला जवान देश की यह शान अपनी खुशी ऐसे व्यक्त कर रही हैं यह बदलते बस्तर है यह बदलते सुकमा है.
पहले गोलियों से कांपता था पूरा इलाका
क्या आपने कभी सोचा है जिन नक्सलियों की गोली से पूरा बस्तर रीजन कांपता जो खौफ का दूसरा पर्याय बन चुके थे आज वह लोगों को खाना खिला रहे हैं. स्वरोजगार योजना के जरिए बस्तर रीजन के सुकमा इलाके में इन सरेंडर कर चुके नक्सलियों का एक कैफे खुला है जिसको नाम दिया गया है नेचर फॉरेस्ट कैफे. इंद्रावती नदी के किनारे बने इस कैफे में सरेंडर कर चुके नक्सली नक्सली हिंसा से पीड़ित लोग ही काम करते हैं. हम आपको यह बता दें इंद्रावती नदी वही नदी थी जिसको कभी नक्सली अपनी लाइफ लाइन के रूप में इस्तेमाल करते थे और इसके संसाधन का दोहन कर भारत की अखंडता और अस्मिता को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया.
डीएसपी छत्तीसगढ़ पुलिस ने कहा कि नक्सलवाद के सफाई के बाद अब इन महिलाओं को अनुभव है कि अंदरुनी आदिवासी इलाकों के लोगों को क्या दिक्कत है अब यह अपना इनपुट संबंधित एजेंसियों को दे रहे हैं ताकि उनके बेहतरीन के लिए कल्याणकारी योजना बना सके.
छत्तीसगढ़ को नक्सली मुक्त बनाने में अलग-अलग टीमों ने अपना योगदान दिया था लेकिन इनमें से एक बहुत महत्वपूर्ण थे वह है आईजी बस्तर रेंज सुंदरराज पी. बस्तर रीजन में उनके 14 सालों की तैनाती के अनुभव को इस्तेमाल किया गया और एक पुख्ता योजना नक्सली सफाई की तैयार की गई.



