अगर तेल की कीमतों में नरमी आती है और वैश्विक हालात सुधर गए, तो ही भारतीय दिग्गज कंपनियां वापस उस मुकाम पर पहुंचने की उम्मीद कर सकती हैं. फिलहाल हालात सामान्य होना मुश्किल है.
एक वक्त था जब दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों की लिस्ट में भारत का नाम भी बड़े गर्व से शामिल हुआ करता था, लेकिन अब हालात ऐसे बदले हैं कि इस लिस्ट में भारत की एक भी कंपनी नहीं बची है. रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), HDFC बैंक, भारती एयरटेल और इंफोसिस जैसी दिग्गज कंपनियां, जो कभी इस लिस्ट का हिस्सा हुआ करती थीं, अब काफी पीछे खिसक गई हैं. ये गिरावट सिर्फ कुछ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि ये दिखाती है कि भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों का भरोसा किस कदर उठा है और वैश्विक अनिश्चितताओं ने कितनी गहरी चोट की है.
आखिर ये कैसे और क्यों हुआ, इसकी असली वजहें क्या हैं…
टॉप-100 से बाहर होने की कहानी: एक साल में कैसे पलटी बाजी?
ये सफर समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. साल 2025 की शुरुआत में हालात बिल्कुल जुदा थे. उस समय दुनिया की टॉप-100 कंपनियों की लिस्ट में भारत की तीन बड़ी कंपनियां जगह बनाए हुए थीं. रिलायंस इंडस्ट्रीज 57वें स्थान पर, HDFC बैंक 97वें स्थान पर और TCS 84वें स्थान पर मौजूद थी. लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीता, शेयर बाजार पर दबाव बढ़ता गया और इन कंपनियों की चमक फीकी पड़ने लगी.
अब ताजा हालात ये हैं कि रिलायंस इंडस्ट्रीज 106वें स्थान पर खिसक गई है. वहीं, HDFC बैंक 190वें और TCS तो सीधे 314वें पायदान पर पहुंच गई है. गौर करने वाली बात ये है कि TCS का पतन सबसे ज्यादा चौंकाने वाला रहा है, क्योंकि इसने महज एक साल में 84वें स्थान से 314वें स्थान तक की रसातल देखी है. इतना ही नहीं, इंफोसिस जैसी IT कंपनी 590वें स्थान पर और ITC 702वें स्थान पर पहुंच गई है. साफ है, ये गिरावट किसी एक सेक्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे बाजार में फैली हुई है.
रिलायंस, एयरटेल और TCS समेत 5 कंपनियों की मार्केट वैल्यू कैसे घटी?
अगर इन गिरावटों को गहराई से समझें, तो हर कंपनी की अपनी एक अलग कहानी है, लेकिन सबकी वजहें एक जैसी हैं:
- रिलायंस इंडस्ट्रीज पर दोहरी मार: मुकेश अंबानी की इस कंपनी की मार्केट वैल्यू को सबसे ज्यादा चोट कच्चे तेल की कीमतों में हुई भारी बढ़ोतरी ने पहुंचाई है. भले ही रिलायंस ने रिटेल, टेलीकॉम और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे कई सेक्टरों में कदम रखे हैं, लेकिन इसकी कमाई का 50% से ज्यादा हिस्सा आज भी पेट्रोकेमिकल्स और ऑयल-टू-केमिकल्स (O2C) कारोबार से ही आता है. पश्चिम एशिया में US-ईरान-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया. इसका सीधा असर ये हुआ कि रिलायंस के O2C सेगमेंट का EBITDA मार्जिन 130 bps गिरकर सिर्फ 7.9% रह गया और कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट साल-दर-साल 12.5% गिर गया. नतीजतन, मुकेश अंबानी की नेटवर्थ में 2026 में अब तक 16.9 बिलियन डॉलर (करीब 1.63 लाख करोड़ रुपये) की गिरावट आ चुकी है.
- HDFC बैंक का गवर्नेंस विवाद और FII की रिकॉर्ड बिकवाली: HDFC बैंक की कहानी सबसे नाटकीय है. मार्च 2026 में बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन आतनु चक्रवर्ती ने अचानक इस्तीफा दे दिया. अपने इस्तीफे में उन्होंने ‘पिछले दो सालों के दौरान कुछ ऐसी घटनाओं और प्रथाओं’ का हवाला दिया जो उनकी ‘शान के खिलाफ थीं’. इस रहस्यमय बयान ने बैंक के कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए. नतीजतन, तीन ही दिनों में निवेशकों की करीब 1.35 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति डूब गई. मार्च तिमाही में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने HDFC बैंक के करीब 35,000 करोड़ रुपए के शेयर बेच डाले और शेयर 26.2% टूट गया, जो मार्च 2020 के बाद की सबसे बड़ी तिमाही गिरावट थी.
- TCS और इंफोसिस में AI का खौफ और वैल्यूएशन का बुलबुला: TCS और इंफोसिस की मार्केट वैल्यू गिरने की कहानी थोड़ी अलग है. यहां सबसे बड़ा खलनायक बनकर उभरा है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बढ़ता दबदबा. कोविड के बाद के दौर में IT कंपनियों को जिस तेजी से काम मिला था, अब AI की वजह से कंपनियों के काम करने के तरीके पूरी तरह बदल रहे हैं. इससे TCS जैसी पारंपरिक IT सर्विस देने वाली कंपनियों को सीधा खतरा है. दिसंबर 2024 में TCS का शेयर अपने सबसे ऊंचे स्तर 4,494 रुपए पर था, लेकिन फरवरी 2026 में ये गिरकर अपने 52 हफ्तों के सबसे निचले स्तर 2,776 रुपए पर आ गया, यानी 38% की गिरावट. ब्रोकरेज फर्म्स का भी मानना है कि जिन ऊंचे वैल्यूएशन पर TCS ट्रेड कर रही थी, वो अब टिक नहीं पाएंगे और इसमें एक बड़ा ‘वैल्यूएशन डी-रेटिंग’ हो रहा है.
- भारती एयरटेल को कम नुकसान: बाकी दिग्गज कंपनियों के मुकाबले एयरटेल ने थोड़ी मजबूती दिखाई है. यह अब देश की दूसरी सबसे वैल्यूएबल कंपनी बन गई है, लेकिन इसकी मार्केट वैल्यू भी इस साल 8% गिर चुकी है. विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने इस पर भी दबाव बनाया हुआ है. हालांकि, इसके टेलीकॉम बिजनेस की मजबूती की वजह से इसे दूसरों की तुलना में कम नुकसान हुआ है.
आखिर ये सब हुआ क्यों हुआ और वजहें क्या हैं?
- पश्चिम एशिया में जंग का आग में घी डालना: फरवरी 2026 में जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया, तब से ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’, लगभग बंद हो गया है. दुनिया की 20% तेल आपूर्ति इसी रास्ते से होती है. नतीजा ये हुआ कि कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर से बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई. भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% तेल आयात करता है, इसलिए ये बढ़त सीधे देश की मेंहगाई, राजकोषीय घाटे और कंपनियों के मुनाफे पर चोट करती है.
- विदेशी निवेशकों का रिकॉर्डतोड़ पलायन: शायद सबसे बड़ी वजह यही है. विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय बाजार से जमकर पैसा निकाल रहे हैं. 2026 में अब तक वो 2.06 लाख करोड़ रुपए के शेयर बेच चुके हैं. डॉलर में देखें तो ये 22 बिलियन डॉलर है, जो पिछले साल के 19 बिलियन डॉलर के आंकड़े को भी पार कर गया है. यह दो दशकों का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है. इसकी अहम वजह ये है कि विदेशी निवेशकों को भारत की तुलना में अमेरिका, ताइवान और साउथ कोरिया जैसे बाजार ज्यादा आकर्षक लग रहे हैं, क्योंकि वहां AI और सेमीकंडक्टर जैसे हाई-ग्रोथ सेक्टर हैं, जबकि भारत में इसकी कमी है.
- वैश्विक दिग्गजों ने घटाई भारत की रेटिंग: इस बिकवाली को और हवा तब मिली जब UBS, मॉर्गन स्टेनली, JP मॉर्गन, Goldman Sachs और Citi जैसी दुनिया की दिग्गज ब्रोकरेज कंपनियों ने मार्च और अप्रैल में भारतीय बाजार के लिए अपना आउटलुक घटा दिया. उनकी सबसे बड़ी चिताएं भारतीय शेयरों का बहुत ऊंचा वैल्यूएशन, तेल की कीमतों से बढ़ता जोखिम, कमजोर होता रुपया और कंपनियों की सुस्त कमाई है.
तो अब आगे क्या होगा?
सच तो ये है कि टॉप-100 की लिस्ट से बाहर होने की ये खबर भारतीय कंपनियों के लिए एक बड़ा रिएलिटी चेक है. रिलायंस, TCS, HDFC बैंक, एयरटेल और इंफोसिस का मार्केट कैप से बाहर होना सिर्फ एक आंकड़ा भर नहीं, बल्कि ये दिखाता है कि भारतीय कंपनियां कैसे वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, तकनीकी बदलाव और निवेशकों के बदलते रुख का शिकार हो रही हैं. हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशक (DII) अपनी तरफ से बाजार को सहारा देने की पूरी कोशिश कर रहे हैं और इसी अवधि में उन्होंने 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश किया है, जिससे बाजार पूरी तरह से धराशायी नहीं हुआ है.



