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मंत्री भी आउट, भोपाल से बाबरी तक.. सुप्रीम कोर्ट का वो ‘ब्रह्मास्त्र’, जिसका बंगाल में चुनाव से पहले हुआ इस्तेमाल…

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आपको याद होगा, कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार किसी राज्य के मिनिस्टर को पद से हटा दिया था. 2020 में मणिपुर के मिनिस्टर के खिलाफ यह एक्शन हुआ, तो काफी चर्चा हुई. नेताजी 2017 में कांग्रेस के टिकट पर जीते थे, बाद में भाजपा में चले गए.

अयोग्यता की याचिकाएं स्पीकर के पास पड़ी रहीं. SC ने बार-बार निर्देश दिया, लेकिन मणिपुर विधानसभा के स्पीकर खामोश बैठे रहे. आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और तब देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया था. 2026 में इस समय पांच राज्यों में चुनाव प्रक्रिया चल रही है, इस बीच SC ने उन्हीं शक्तियों का इस्तेमाल पश्चिम बंगाल में किया है.

सुप्रीम कोर्ट ने 6 अप्रैल 2026 को पश्चिम बंगाल के चीफ सेक्रेट्री और डीजीपी को फटकार लगाई. राज्य में SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया में लगे न्यायिक अधिकारियों के घेराव की घटना की जांच NIA को दे दी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि NIA उन सभी 12 एफआईआर की जांच करेगी, जो बंगाल पुलिस की ओर से दर्ज की गई थी. कोर्ट ने साफ किया कि एजेंसी सभी आरोपों की जांच करेगी, भले ही वो उसके जांच के दायरे में ना आते हों. कोर्ट ने कहा कि आरोप राज्य पुलिस के अधिकारियों पर है, इसलिए आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करते हुए यह आदेश दिया जा रहा है. कोर्ट ने राज्य पुलिस से कहा कि वो तुंरत जांच से जुड़े दस्तावेज /केस डायरी तुरंत NIA को सौंपे. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि यह 142 वाला विशेषाधिकार क्या है?

क्या कहता है संविधान का आर्टिकल 142

  1. संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत, सुप्रीम कोर्ट ऐसा आदेश दे सकता है, जो उसके सामने लंबित पड़े किसी भी मामले को पूर्ण करने के लिए आवश्यक लगे.
  2. खास बात यह है कि इस विशेषाधिकार के तहत दिया गया आदेश पूरे देश में तब तक लागू रहेगा, जब तक इससे संबंधित कोई दूसरा प्रावधान लागू नहीं हो जाता.
  3. संसद में बनाए कानूनों के तहत देश की सबसे बड़ी अदालत को पूरे देश में कहीं भी ऐसा आदेश देने की शक्ति है, जो किसी व्यक्ति, दस्तावेज या स्वयं की अवमानना की जांच और दंड से जुड़ा हो.

सुप्रीम कोर्ट ने कब-कब आर्टिकल 142 का इस्तेमाल किया?

इस आर्टिकल का इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट कम्प्लीट जस्टिस यानी पूर्ण न्याय के लिए करता है. ऐसे समय, जब कानून की सामान्य प्रक्रिया अपर्याप्त साबित हो रही हो. अब जानिए, इस विशेषाधिकार का इस्तेमाल हाल के वर्षों में कब-कब किया गया?

  • 1989- भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के लिए अंतरिम राहत और मुआवजा देने के लिए.
  • 1997- विशाखा गाइडलाइंस पर (कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ दिशानिर्देश).
  • 2014- कोल ब्लॉक आवंटन रद्द करने के लिए.
  • 2019- अयोध्या विवाद पर.

इसके अलावा चंडीगढ़ मेयर चुनाव के परिणाम को पलटने के लिए भी कोर्ट ने इसी ‘ब्रह्मास्त्र’ का इस्तेमाल किया था. तलाक, मेडिकल सीटों और कॉलेजियम प्रणाली को बहाल करने के लिए इसी अधिकार का इस्तेमाल किया जा चुका है.