पूरे देश में महाशिवरात्रि का पर्व जोश और उत्साह के साथ मनाया गया, लेकिन कश्मीर घाटी में इस दिन का रंग कुछ अलग ही नजर आया. यहां कश्मीरी पंडित समुदाय ने महाशिवरात्रि को अपने पारंपरिक नाम ‘हेराथ’ के रूप में मनाया.
यह सिर्फ धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक जुड़ाव का भी बड़ा दिन होता है.
घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडितों के साथ-साथ विस्थापित पंडित कर्मचारी और उनके परिवारों ने भी पूरे उत्साह के साथ यह पर्व मनाया. घर-घर में पूजा हुई, पारंपरिक पकवान बने और रिश्तेदारों से मेलजोल का दौर चला.
3 दिन तक चलता है हेराथ का पर्व
कश्मीर में महाशिवरात्रि सिर्फ एक दिन का त्योहार नहीं है. यह तीन दिन तक मनाया जाता है. इस दौरान भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन के साथ-साथ भैरव-भैरवी की पूजा भी की जाती है.
सबसे खास बात यह है कि पूजा घर के लोग खुद करते हैं. किसी पंडित या पुजारी को बुलाने की परंपरा नहीं है. परिवार के सदस्य ही मंत्र और श्लोक पढ़ते हैं और पूरी पूजा घर के अंदर होती है. तीसरे दिन मंदिरों में खास रौनक रहती है. लोग सुबह-सुबह मंदिर पहुंचते हैं, पूजा करते हैं और फिर दोस्तों व रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं.
शंकराचार्य मंदिर बना आस्था का केंद्र
इस बार सोमवार को शंकराचार्य मंदिर में सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें देखने को मिलीं. डल झील के सामने पहाड़ी पर स्थित यह प्राचीन मंदिर जश्न का मुख्य केंद्र बना रहा. भक्तों ने पूजा-अर्चना की और पारंपरिक रस्में निभाईं.
पूरे परिसर में ‘हर हर महादेव’ के जयकारों की गूंज सुनाई देती रही. इसके अलावा गणपतयार मंदिर और हनुमान मंदिर अमीरा कदल में भी दिनभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहा.
‘वाटुक’ पूजा की खास परंपरा
हेराथ की सबसे खास पहचान है ‘वाटुक’ पूजा. पूजा के लिए दो मिट्टी के मटकों में अखरोट और पानी भरा जाता है. इन्हें शिव और शक्ति का प्रतीक माना जाता है.
इन बड़े मटकों के आसपास कई छोटे-छोटे मटके रखे जाते हैं, जो गणेश और अन्य देवी-देवताओं के प्रतीक होते हैं. इन सभी मटकों के समूह को ‘वाटुक’ कहा जाता है. हर कश्मीरी हिंदू घर में एक वाटुक का होना जरूरी माना जाता है.
इस पूजा में भगवान को मांस और मछली का भोग लगाया जाता है, जो खास तौर पर कश्मीरी पंडितों की परंपरा है. यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है.
संजय कुमार, जिनका परिवार 1990 के दशक की आतंकी हिंसा के बावजूद घाटी में ही रुका रहा, वो कहते हैं कि हमारे लिए हेराथ सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं है. यह हमें याद दिलाता है कि हम कौन हैं.
उन्होंने कहा कि आज लाइफस्टाइल बदल गई है, लेकिन हेराथ का मतलब नहीं बदला. यह त्योहार पीढ़ियों को जोड़ता है और परंपराओं को जिंदा रखता है. घर में बड़ी पूजा, अखरोट से भरे मिट्टी के बर्तन और पारंपरिक व्यंजन, ये सब मिलकर हेराथ को खास बनाते हैं.
खीर भवानी मंदिर में उमड़ी श्रद्धा
हेराथ के मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंदेरबल जिले के तुलमुल्ला स्थित खीर भवानी मंदिर पहुंचे. यहां भक्तों ने पूजा की और शांति, खुशहाली व सांप्रदायिक सद्भाव की कामना की.
गंदेरबल और आसपास के इलाकों से आए श्रद्धालुओं के अलावा, कई विस्थापित पंडित कर्मचारी भी अपने कैंपों से यहां पहुंचे. जिला प्रशासन ने सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाएं पुख्ता रखीं, जिससे श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी न हो.
सिर्फ कश्मीर ही नहीं, बल्कि जम्मू और देश-विदेश में रह रहे कश्मीरी पंडितों ने भी इस पर्व को पूरे उत्साह से मनाया. परिवारों ने घर पर पूजा की, पारंपरिक खाना बनाया और पुराने दिनों की यादें ताजा कीं.
बडगाम, गंदेरबल, कुलगाम, अनंतनाग, शोपियां और कुपवाड़ा जैसे इलाकों में रहने वाले माइग्रेंट पंडित कर्मचारियों ने भी अपने-अपने स्थानों पर सामूहिक रूप से यह पर्व मनाया.
भक्तों का कहना था कि इस बार मौसम साफ और धूप वाला रहा, जिससे त्योहार का माहौल और भी खुशनुमा हो गया. स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटक भी इस खास अंदाज में मनाए जाने वाले हेराथ को देखने के लिए उत्साहित नजर आए.



