बांग्लादेश में नई सरकार की शपथ की तैयारियां जोरों पर हैं. सत्ता बदलने की इस हलचल के बीच एक दिलचस्प सवाल चर्चा में है कि क्या दुनिया में कोई ऐसा देश है जहां हर साल राष्ट्रपति बदल जाता है?
जहां राष्ट्रपति की कुर्सी पांच साल नहीं, सिर्फ 12 महीने के लिए मिलती है? यह सुनने में अजीब जरूर लगता है, लेकिन सच है. आइए जानते हैं उस देश के बारे में, जहां सत्ता का यह अनोखा मॉडल दशकों से सफलतापूर्वक चल रहा है.
कौन है वह देश?
यूरोप का खूबसूरत और शांत देश Switzerland अपनी प्राकृतिक सुंदरता, मजबूत बैंकिंग सिस्टम और स्थिर लोकतंत्र के लिए जाना जाता है, लेकिन इसकी राजनीति का एक पहलू इसे और भी खास बनाता है, यहां हर साल राष्ट्रपति बदल जाता है. स्विट्जरलैंड में राष्ट्रपति का कार्यकाल केवल एक वर्ष का होता है. हर साल 1 जनवरी को नया राष्ट्रपति पद संभालता है. यह परंपरा कोई नई नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है.
कैसे चुना जाता है राष्ट्रपति?
स्विट्जरलैंड में राष्ट्रपति का चुनाव आम जनता सीधे नहीं करती है. वहां की संघीय संसद राष्ट्रपति का चयन करती है. आमतौर पर यह पद वरिष्ठता के आधार पर फेडरल काउंसिल के किसी सदस्य को सौंपा जाता है. देश की कार्यपालिका सात सदस्यों वाली फेडरल काउंसिल के हाथ में होती है. इन्हीं सात सदस्यों में से हर साल एक को राष्ट्रपति चुना जाता है. यानी राष्ट्रपति कोई अलग शक्तिशाली पद नहीं, बल्कि सात सदस्यीय टीम का ही हिस्सा होता है.
फर्स्ट अमंग इक्वल्स की अवधारणा
स्विट्जरलैंड में राष्ट्रपति को फर्स्ट अमंग इक्वल्स यानी बराबरी में पहला माना जाता है. इसका मतलब यह है कि राष्ट्रपति के पास अतिरिक्त कार्यकारी शक्तियां नहीं होतीं हैं. सभी बड़े फैसले सामूहिक रूप से लिए जाते हैं. कोई एक व्यक्ति पूरे देश की नीति तय नहीं करता है. यही वजह है कि यहां सत्ता का केंद्रीकरण नहीं होता और राजनीतिक संतुलन बना रहता है.
हर साल बदलाव क्यों?
हर साल राष्ट्रपति बदलने के पीछे सोच यह है कि नेतृत्व साझा रहे और किसी एक व्यक्ति के हाथ में ज्यादा ताकत न आ जाए. इस मॉडल से सत्ता का संतुलन कायम रहता है और सभी दलों को प्रतिनिधित्व का मौका मिलता है. स्विट्जरलैंड की बहुदलीय व्यवस्था में यह तरीका राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में मददगार साबित हुआ है.
राष्ट्रपति की भूमिका क्या होती है?
हालांकि राष्ट्रपति के पास अतिरिक्त शक्तियां नहीं होतीं, लेकिन वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व करते हैं. विदेश यात्राओं, वैश्विक बैठकों और कूटनीतिक कार्यक्रमों में वे स्विट्जरलैंड की आवाज बनते हैं. नीतिगत और प्रशासनिक फैसले पूरी फेडरल काउंसिल मिलकर लेती है. यानी सरकार टीमवर्क के आधार पर चलती है, न कि एक व्यक्ति के नेतृत्व पर.
प्रत्यक्ष लोकतंत्र की परंपरा
स्विट्जरलैंड की पहचान उसके प्रत्यक्ष लोकतंत्र से भी जुड़ी है. यहां नागरिक जनमत संग्रह के जरिए अहम फैसलों में सीधे हिस्सा लेते हैं. कानूनों और नीतियों पर जनता की राय ली जाती है.
इससे सरकार और नागरिकों के बीच भरोसा मजबूत रहता है. यही वजह है कि सालाना राष्ट्रपति बदलने के बावजूद देश में राजनीतिक अस्थिरता नहीं दिखती है.
दुनिया के लिए क्या संदेश?
जब कई देशों में सत्ता का केंद्रीकरण और लंबा कार्यकाल चर्चा का विषय रहता है, तब स्विट्जरलैंड का मॉडल अलग राह दिखाता है. यहां स्थिरता व्यक्ति पर नहीं, बल्कि व्यवस्था पर आधारित है. हर साल राष्ट्रपति बदलना वहां के लोकतांत्रिक ढांचे का हिस्सा है और यह दशकों से सफलतापूर्वक चल रहा है. यही कारण है कि स्विट्जरलैंड को दुनिया के सबसे मजबूत लोकतंत्रों में गिना जाता है.



