छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ जंग में सफलता की बात गृह मंत्री ने कही है. उन्होंने बस्तर को लेकर मास्टर प्लान पेश किया है.
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ सफलता
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ जारी लड़ाई अब अपने अंतिम और निर्णायक चरण में पहुंचती दिख रही है. केंद्र सरकार द्वारा तय 31 मार्च 2026 की डेडलाइन को लेकर राज्य सरकार पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ रही है. बीते दो वर्षों में सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई, बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण और पुनर्वास योजनाओं ने नक्सल मोर्चे की तस्वीर बदल दी है. गृह मंत्री विजय शर्मा ने साफ किया है कि सरकार की रणनीति केवल हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि नक्सलवाद के बाद बस्तर को शांति, विकास और मुख्यधारा से जोड़ने का भी स्पष्ट रोडमैप तैयार किया गया है.
गृह मंत्री विजय शर्मा ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर इस लक्ष्य पर काम कर रही हैं कि मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त हो जाए. सरकार पूरी ताकत के साथ इस दिशा में जुटी है और बस्तर के सुदूर अंचलों तक संविधान और शासन की उपस्थिति सुनिश्चित करने के प्रयास लगातार जारी है.
पिछले तीन वर्षों के आंकड़े नक्सल मोर्चे पर सरकार की सख्त कार्रवाई और बढ़ती सफलता को दर्शाते हैं. गृह मंत्री ने बताया कि वर्ष 2024 में 10, 2025 में 20 और 2026 के शुरुआती दो महीनों में 5 एके-47 हथियार बरामद किए गए हैं. इसके अलावा 2025 में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों से 26 एके-47 हथियार मिले हैं. कुल मिलाकर तीन वर्षों में 1100 से अधिक हथियार जब्त किए गए हैं. इसी अवधि में 532 नक्सली मारे गए, 2004 को गिरफ्तार किया गया और 2700 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का रास्ता चुना है.
नक्सलवाद के खात्मे के बाद सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आत्मसमर्पित नक्सलियों का स्थायी पुनर्वास है. विजय शर्मा ने बताया कि प्रदेश में फिलहाल 7 पुनर्वास केंद्र संचालित किए जा रहे हैं. इन केंद्रों से अब तक करीब 1700 लोग जुड़ चुके हैं, जिनमें 410 महिलाएं भी शामिल हैं. वर्तमान में 232 लोग इन केंद्रों में प्रशिक्षण ले रहे हैं. सरकार का दावा है कि इन पुनर्वास केंद्रों की कार्यप्रणाली की देशभर में सराहना हो रही है.
पुनर्वास नीति का एक अहम पहलू आत्मसमर्पित नक्सलियों को उनके परिवार और समाज से जोड़ना है. पुनर्वास केंद्रों में सप्ताह में एक दिन उनके परिजनों को बुलाकर पूरे दिन साथ रहने, भोजन करने और संवाद की व्यवस्था की जाती है. इसके साथ ही पुनर्वासित नक्सली जेलों में जाकर अपने पुराने साथियों से मिलते हैं और उन्हें यह संदेश देते हैं कि अगर जंगल से पुनर्वास संभव है, तो जेल से भी पुनर्वास का रास्ता खुला है. सरकार पैरोल और जमानत के जरिए उन्हें पुनर्वास केंद्रों से जोड़ने का हरसंभव प्रयास कर रही है.
सरकार पुनर्वासित नक्सलियों को सम्मानजनक जीवन देने पर जोर दे रही है. यदि कोई शादी करना चाहता है तो सामूहिक विवाह की सुविधा भी उपलब्ध कराई जा रही है. हाल ही में मुख्यमंत्री के नारायणपुर दौरे के दौरान नक्सली जोड़ों का सामूहिक विवाह इसका उदाहरण है. पुनर्वासित युवाओं को मोबाइल फोन, जूते-चप्पल, ट्रैक सूट जैसी सामग्री वाली वेलकम किट दी जाती है. इसके साथ ही आधार कार्ड, राशन कार्ड और आयुष्मान कार्ड जैसी सभी जरूरी पहचान और योजनाओं से उन्हें जोड़ा जा रहा है.
गृह मंत्री विजय शर्मा का मानना है कि मोबाइल फोन पुनर्वास की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभा रहा है. मोबाइल के जरिए ये युवा दुनिया से जुड़ रहे हैं, सोशल मीडिया देख रहे हैं और एक सामान्य नागरिक की तरह जीवन जीने की कल्पना कर पा रहे हैं. सरकार का दावा है कि जब वे तकनीक और समाज से जुड़ते हैं, तो दोबारा जंगल लौटने की मानसिकता खुद-ब-खुद खत्म हो जाती है.
सरकार ने नक्सलियों और उनके परिजनों तक संदेश पहुंचाने के लिए रेडियो को प्रभावी माध्यम बनाया है. जगदलपुर, सरायपाली, विशाखापट्टनम, चंद्रपुर, गढ़चिरौली, कालाहांडी, बलांगीर, बालाघाट और मंडला जैसे क्षेत्रों के रेडियो स्टेशनों से रोजाना सुबह और शाम अपील प्रसारित की जा रही है. इन संदेशों में समाज के प्रमुख लोगों, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और आईजी बस्तर की अपील शामिल है, ताकि नक्सली हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौट सकें.
पूरे अभियान की सफलता का श्रेय सुरक्षा बलों के जवानों को जाता है. जिनकी बहादुरी और बलिदान से यह संभव हो पाया. इसके साथ ही सरकार बस्तर ओलंपिक, माटी तिहार और बस्तर पंडुम जैसे कार्यक्रमों के जरिए युवाओं को खेल, संस्कृति और समाज से जोड़ने का प्रयास कर रही है.
इस दौरान विजय शर्मा ने पूर्व मुख्यमंत्री पर भी तीखा हमला बोला. उन्होंने झीरम घाटी घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि उस हमले में छत्तीसगढ़ का नेतृत्व समाप्त हुआ था और आज उस घटना की सजा नक्सलियों को सशस्त्र बल दे रहे हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि जब नक्सलवाद अंतिम चरण में है, तो 31 मार्च 2026 के बाद भी कुछ समय तक सतर्कता बरतने की जरूरत को लेकर सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार और नक्सल मामलों के जानकार उचित शर्मा का मानना है कि नक्सलवाद का अंत आसान नहीं होता. उनके अनुसार, भले ही यह समस्या अंतिम दौर में हो, लेकिन उसके बाद रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी चुनौतियां सामने आएंगी. संपूर्ण विकास और मुख्यधारा में पूरी तरह लौटने में दो-तीन साल का अतिरिक्त समय लग सकता है. मौजूदा प्रयास सकारात्मक हैं और इसे एक बड़ी सामूहिक उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए.
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान अब सिर्फ सुरक्षा कार्रवाई नहीं, बल्कि पुनर्वास, विश्वास और विकास का समन्वित मॉडल बनता जा रहा है. मार्च 2026 की डेडलाइन के साथ सरकार का दावा है कि बस्तर जल्द ही बंदूक की छाया से निकलकर शांति और प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ेगा.



