लखनऊ हाईकोर्ट में एक सुनवाई के दौरान पता चला कि उत्तर प्रदेश में पिछले दो साल में एक लाख से ज्यादा लोग लापता हुए.हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से इस पर विस्तृत ब्योरा मांगा है.
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के चिनहट निवासी विक्रमा प्रसाद का बेटा जुलाई 2024 में लापता हो गया था.चिनहट थाने में उन्होंने बेटे की गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज हुई थी लेकिन पुलिस की ओर से संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई जिससे उनके बेटे का कुछ पता नहीं चल सका.
इस पर उन्होंने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की और फिर कोर्ट के कड़े रुख के बाद, घटना के करीब पांच महीने बाद एफआईआर दर्ज की गई.विक्रमा प्रसाद की इस याचिका पर हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में सुनवाई हुई.सुनवाई के दौरान जस्टिस अब्दुल मोईन और जस्टिस बबिता रानी ने सरकार से राज्य भर में गुमशुदा लोगों की जानकारी तलब की और विस्तृत हलफनामा मांगा.
और जब इस मामले में सरकार की ओर से जानकारी दी गई तो सुनवाई करने वाली पीठ के जजों के भी होश उड़ गए.यूपी के अपर मुख्य सचिव गृह की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में बताया गया कि 1 जनवरी 2024 से लेकर 18 जनवरी 2026 तक राज्य में कुल 1,08,300 लोग गुमशुदा हुए, जिनमें सिर्फ 9,700 लोगों के बारे में पुलिस पता लगा सकी.
इंटिमेट पार्टनर वॉयलेंस: भारत में महिलाओं के खिलाफ बढ़ता, लेकिन अनदेखा अपराधइन आंकड़ों की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने यूपी पुलिस के इस सुस्त और हीलाहवाली करने वाले रवैये पर नाराजगी जताई.पुलिस की निष्क्रियता को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए, हाईकोर्ट ने इन आंकड़ों को “चौंकाने वाला” बताया.
बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा, “हम लापता लोगों से संबंधित शिकायतों पर अधिकारियों के रवैये के प्रति बहुत हैरान हैं, क्योंकि इस तरह के मामलों में जाहिर तौर पर तुरंत कार्रवाई की जरूरत होती है”
व्यक्तिगत याचिका बनी जनहित याचिकाकोर्ट ने मामले की अगले दिन भी सुनवाई की और इसे व्यापक जनहित से जुड़ा मानते हुए खुद संज्ञान लिया और कोर्ट रजिस्ट्री को इस मामले को “प्रदेश में गुमशुदा लोगों के संबंध में” शीर्षक से जनहित याचिका दर्ज करने का आदेश दिया.
इस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान पांच फरवरी को कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई 23 मार्च को होगी, जिसमें अपर मुख्य सचिव गृह और डीजीपी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उपस्थित रहना अनिवार्य होगा.



