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भारत में कैसे पड़ रही बेरोजगारी और कर्ज की दोहरी मार…

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भारत में इस समय आम आदमी पर दो तरफ से चोट पड़ रही है. एक नौकरियों का संकट गहराता जा रहा है, तो दूसरा जिनके पास काम है वे कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं. मई 2026 में देश की बेरोजगारी दर 5.5 फीसदी पर पहुंच गई, जो पिछले करीब एक साल का सबसे ऊंचा स्तर है.

वहीं घरेलू कर्ज GDP के 45.5 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर जा पहुंचा है. यह दोहरी मार अब सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक संकट बन चुकी है.

आखिर यह संकट पैदा कैसे हुआ, डिजिटल लेंडिंग ऐप्स इसमें क्या भूमिका निभा रहे हैं और इससे बचने के क्या रास्ते हैं…

मार नंबर 1: बेरोजगारी जो थमने का नाम नहीं ले रही

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के मुताबिक, मई 2026 में बेरोजगारी दर बढ़कर 5.5 फीसदी हो गई, जबकि अप्रैल में यह 5.2 फीसदी और मार्च में 5.1 फीसदी थी. यानी 2026 की शुरुआत से ही बेरोजगारी लगातार ऊपर जा रही है. सरकारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के तिमाही आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में बेरोजगारी दर 5.0 फीसदी दर्ज की गई थी और अगली तिमाही में इसके और बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं.

शहरों की स्थिति गांवों के मुकाबले कहीं ज्यादा खराब है. अप्रैल 2026 में शहरी बेरोजगारी दर 6.6 फीसदी थी, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह 4.6 फीसदी रही. सबसे बड़ी मार युवाओं पर पड़ रही है. 15 से 24 साल की उम्र के पढ़े-लिखे युवाओं में बेरोजगारी दर 45 फीसदी के पार पहुंच चुकी है, जो बताता है कि हर दो में से एक पढ़े-लिखे नौजवान के पास काम नहीं है. कुल मिलाकर युवा बेरोजगारी दर 10.2 फीसदी के स्तर पर बनी हुई है, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी है.

मार नंबर 2: घरेलू कर्ज जो रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया

नौकरी न मिलने या कम वेतन मिलने की वजह से लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज का सहारा ले रहे हैं. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की जून 2026 में जारी वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2026 तक भारत का घरेलू कर्ज बढ़कर GDP के 45.5 फीसदी पर पहुंच गया. यह अपने ही पांच साल के औसत 42.9 फीसदी से काफी ऊपर है.

कोविड-19 महामारी से पहले यह आंकड़ा 38 फीसदी था, यानी महामारी के बाद से घरेलू कर्ज में 7 फीसदी से ज्यादा इजाफा हो चुका है.

सबसे चिंताजनक बात यह है कि कुल घरेलू कर्ज में 58.4 फीसदी हिस्सा नॉन-हाउसिंग रिटेल लोन यानी गैर-आवासीय खुदरा कर्ज का है. इसमें से आधी रकम सिर्फ रोजाना के खर्चों के लिए ली गई है. इसका सीधा मतलब यह है कि लोग खाने-पीने, बिजली-पानी के बिल, मेडिकल खर्च और दूसरी बुनियादी जरूरतों के लिए कर्ज ले रहे हैं. यह कर्ज उत्पादक नहीं है, बल्कि सिर्फ गुजर-बसर करने के लिए है.

दूसरे उभरते देशों की तुलना में भारत घरेलू कर्ज के मामले में चौथे स्थान पर है. थाईलैंड (87.3 फीसदी), मलेशिया (69.9 फीसदी) और चीन (59 फीसदी) से तो यह कम है, लेकिन जिस रफ्तार से बढ़ रहा है वह चिंता पैदा करती है. इसके अलावा देश की नेट वित्तीय बचत दर 2021 के 7 फीसदी से गिरकर 2026 में महज 5 फीसदी रह गई है. यानी लोगों की कमाई घट रही है और जो थोड़ी-बहुत बचत थी वह भी तेजी से खत्म हो रही है.

कर्ज के जाल में कैसे फंस रहे भारतीय?

इस पूरे संकट में सबसे खतरनाक किरदार डिजिटल लेंडिंग ऐप्स का है, जिन्होंने कम आय वाले लोगों को अपना सबसे आसान शिकार बनाया है. बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय पहले कभी इतने कर्ज में नहीं डूबे थे और डिजिटल लेंडर्स अब हर चार में से पांच पर्सनल लोन जारी कर रहे हैं. ये ऐप्स भारत के वर्किंग क्लास को निशाना बनाते हैं, जिनमें कम वेतन वाले कर्मचारी, कॉन्ट्रैक्ट वर्कर, डिलीवरी एग्जीक्यूटिव और ऑटो ड्राइवर जैसे लोग शामिल हैं.

इन ऐप्स का काम करने का तरीका बेहद हमलावर और चालाक है. वित्तीय वर्ष 2025 में अकेले फिनटेक प्लेटफॉर्म्स ने 13 करोड़ से ज्यादा छोटे-छोटे लोन बांटे, जिनकी औसत रकम महज 16,000 रुपये थी. तीन क्लिक में लोन मिल जाने का लालच इतना बड़ा होता है कि लोग शर्तों को ध्यान से पढ़ते नहीं हैं. इन लोन पर सालाना ब्याज दर 36 से 40 फीसदी तक होती है, लेकिन असली चाल प्रोसेसिंग फीस के नाम पर छिपी होती है, जो लोन की रकम का 10 से 15 फीसदी तक वसूल ली जाती है, वह भी लोन देने से पहले ही.

कई मामलों में तो रोजाना 1 फीसदी की दर से ब्याज लगाई जाती है, जो सालाना 365 फीसदी बैठता है. इसके अलावा मौजूदा नियमों में न तो यह सीमा तय है कि एक व्यक्ति एक साथ कितने लोन ले सकता है और न ही ब्याज दर पर कोई कैप लगाई गई है.

मनीलाइफ फाउंडेशन ने 107 डिजिटल लेंडिंग ऐप्स की गहराई से स्टडी की. जो केस स्टडीज सामने आईं वे दिल दहला देने वाली हैं. इनमें से कुछ उदाहरण देखें:

इस स्टडी का सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह रहा कि 13 केस स्टडीज में से 11 मामलों में लोगों की हर महीने की EMI उनकी मंथली इनकम से ज्यादा थी. औसतन लोग अपनी इनकम का 200 फीसदी हिस्सा सिर्फ EMI चुकाने में लगा रहे थे. इसका मतलब यह हुआ कि वे अपनी कमाई से दोगुनी रकम कर्ज चुकाने के लिए मजबूर हैं. इस स्थिति से निपटने का उनके पास सिर्फ एक ही रास्ता बचता है- एक और नया कर्ज लेना.

बेरोजगारी और कर्ज: दोनों मार एक दूसरे को कैसे मजबूत करती हैं?

बेरोजगारी और कर्ज का यह संकट अलग-अलग नहीं है.

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, कम वेतन और बढ़ती जीवन-यापन की लागत से जूझ रहे बहुत से लोग लेंडिंग ऐप्स के लालच में आकर नए कर्ज ले रहे हैं, सिर्फ इसलिए ताकि पुराने कर्ज की ब्याज की किस्त चुका सकें. यानी कर्ज अब एक ऐसा जाल बन गया है जिसमें लोग कर्ज चुकाने के लिए ही कर्ज लेने को मजबूर हैं.

अर्थशास्त्री एंडी मुखर्जी ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि जो लोग किसी तरह काम ढूंढ़ भी लेते हैं, उनमें भी एक कड़वी निराशा घर कर रही है, क्योंकि हर गुजरते महीने के साथ वे कर्ज के दलदल में और गहरे धंसते जा रहे हैं.

मनीलाइफ फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, कर्ज के शिकार लोग मुख्य रूप से दो कैटेगरी में आते हैं:

  • 26 से 45 साल के सैलरीड या इन्फॉर्मल सेक्टर के कामगार हैं, जिन्होंने किसी हेल्थ इमरजेंसी के चलते पहली बार किसी डिजिटल लोन ऐप से कर्ज लिया. फिर एक के बाद एक कई लोन लेते-लेते पूरी तरह जाल में फंस गए.
  • पढ़े-लिखे और अच्छी खासी कमाई वाले प्रोफेशनल हैं, जैसे सॉफ्टवेयर इंजीनियर. इन्होंने शेयर ट्रेडिंग में पैसा गंवा दिया, क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन की सारी लिमिट खत्म कर लीं और फिर आखिरी सहारे के रूप में इन महंगे डिजिटल कर्ज की तरफ भागे.

सरकार और RBI क्या कर रहे हैं?

RBI ने अप्रैल 2024 में एक अहम कदम उठाते हुए सभी लेंडर्स के लिए की फैक्ट्स स्टेटमेंट (KFS) देना अनिवार्य कर दिया था. इसमें ब्याज दर, प्रोसेसिंग फीस, लेट फीस और दूसरे सभी चार्ज साफ-साफ बताने होते हैं. लेकिन जमीनी स्तर पर यह नियम पूरी तरह से लागू नहीं हुआ. अब भी सैकड़ों ऐप्स बिना किसी डर के धड़ल्ले से काम कर रहे हैं. सरकार ने 6 लोन ऐप्स को बंद करने के नोटिस जारी किए थे, लेकिन यह समस्या पर मरहम लगाने जैसा कदम है, जबकि बाजार में हजारों ऐसे ऐप्स मौजूद हैं जो लोगों को ठग रहे हैं.

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने फरवरी 2025 में एक बड़ी कार्रवाई करते हुए 719 करोड़ रुपये के फर्जी लोन ऐप नेटवर्क से जुड़ी 123.58 करोड़ रुपये की संपत्तियां फ्रीज की थीं.

RBI की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक, बैंकिंग सेक्टर की ग्रॉस NPA महज 1.8 फीसदी के निचले स्तर पर है, यानी बैंकों को फिलहाल कोई बड़ा नुकसान नहीं हो रहा है, लेकिन आम आदमी की जेब लगातार खाली होती जा रही है. सेविंग्स पूरी तरह खत्म हो चुकी है.

इस दोहरी मार से बचने का रास्ता क्या है?

HDFC बैंक में कमोडिटी हेड अनुज गुप्ता कहते हैं, ‘आम लोगों को सबसे पहले यह समझना होगा कि जो डिजिटल लोन ऐप 25 फीसदी से ज्यादा सालाना ब्याज या एक-दो हफ्ते की रिपेमेंट अवधि की पेशकश कर रहे हैं, उनसे पूरी तरह दूर रहना ही समझदारी है.

किसी भी ऐप को अपने फोन के कॉन्टैक्ट्स, फोटो या मीडिया फाइलों की एक्सेस देने से पहले सौ बार सोचना चाहिए, क्योंकि वसूली के नाम पर यही डेटा बाद में ब्लैकमेल करने का सबसे बड़ा हथियार बनता है. जब तक कमाई स्थिर न हो, तब तक जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने से बचना चाहिए और किसी भी लोन एग्रीमेंट को साइन करने से पहले की फैक्ट्स स्टेटमेंट जरूर पढ़ना चाहिए.’

सरकार और RBI को अब आधे-अधूरे कदमों से आगे बढ़कर सख्त फैसले लेने होंगे:

  • एक व्यक्ति एक साथ कितने लोन ले सकता है और ब्याज दर की अधिकतम सीमा क्या होगी, इस पर साफ नियम बनाए जाएं.
  • फर्जी और शातिर लोन ऐप्स के खिलाफ लगातार और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि ये दोबारा सिर न उठा सकें.
  • क्रेडिट ब्यूरो को भी नजर रखना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति अपनी चुकाने की क्षमता से कहीं ज्यादा कर्ज न ले सके.

जब तक नौकरियों के अवसर नहीं बढ़ेंगे और कर्ज के इस बेतहाशा विस्तार पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक आम आदमी का इस दोहरी मार से बच पाना बहुत मुश्किल है. यह संकट अब सिर्फ अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य का सवाल बन चुका है.