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नील-हरित काई से खेती की लागत घटा रहे किसान, जैव उर्वरक की ओर बढ़ते कदम…

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खेती को अधिक टिकाऊ, किफायती और पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में बालोद जिले के किसान अब नील-हरित काई (ब्लू ग्रीन एल्गी) जैसे जैव उर्वरक को अपना रहे हैं। इससे न केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो रही है, बल्कि खेती की लागत में भी उल्लेखनीय कमी आ रही है।

उप संचालक कृषि ने बताया कि नील-हरित शैवाल, जिसे वैज्ञानिक भाषा में सायनोबैक्टीरिया कहा जाता है, प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है। इसके उपयोग से प्रति हेक्टेयर 25 से 30 किलोग्राम तक नाइट्रोजन की पूर्ति संभव है, जिससे किसानों को रासायनिक उर्वरकों पर कम खर्च करना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण है।

बालोद जिले के पथराटोला, कारूटोला और फरदडीह गांवों के कई किसान अपने खेतों में छोटे गड्ढे तैयार कर नील-हरित काई का उत्पादन कर रहे हैं। किसान रोपाई और वियासी के समय इसका उपयोग कर रहे हैं, जिससे धान की फसल को आवश्यक पोषण मिल रहा है। कृषि विभाग के अनुसार इसके प्रयोग से धान उत्पादन में 8 से 10 प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना है। विशेष रूप से जलभराव वाले धान क्षेत्रों के लिए उपयोगी यह जैव उर्वरक किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। यही कारण है कि जिले में टिकाऊ और कम लागत वाली खेती की नई राह तैयार होती दिखाई दे रही है।