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सरकार ने समंदर में शुरू किया वह काम, चमक जाएगा भारत का भविष्य, कितना अहम यह मिशन?

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बंगाल की खाड़ी में जल्द ही सर्वे जहाज हजारों किलोमीटर तक चक्कर लगाते नजर आ सकते हैं. इनका मकसद समुद्र की सतह के नीचे छिपे तेल और प्राकृतिक गैस के भंडारों का पता लगाना है, जो भारत के ऊर्जा भविष्य को बदल सकते हैं.

भारत हाल के वर्षों में अपने सबसे बड़े समुद्री तेल और गैस खोज अभियानों में से एक की चुपचाप तैयारी कर रहा है. इसके तहत जल्द ही सर्वे जहाज बंगाल की खाड़ी में हजारों किलोमीटर तक चक्कर लगाते नजर आ सकते हैं. इनका मकसद समुद्र की सतह के नीचे छिपे तेल और प्राकृतिक गैस के भंडारों का पता लगाना है, जो भारत के ऊर्जा भविष्य को बदल सकते हैं.

यह विशाल अभियान डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स (DGH) की ओर से तैयार किया जा रहा है. सीएनएन-न्यूज18 के हाथ लगे सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, मोदी सरकार देश के पूर्वी तट पर बड़े पैमाने पर भू-वैज्ञानिक सर्वे की तैयारी कर रही है. इसमें बंगाल-पूर्णिया, महानदी, कृष्णा-गोदावरी, कावेरी और अंडमान के तटीय क्षेत्रों को शामिल किया गया है. इसके लिए 14 मई को टेंडर भी जारी कर दिए गए.

क्या है पूरा प्रोजेक्ट?

तकनीकी भाषा में इस परियोजना को ‘2D Broadband Marine Seismic & Gravity-Magnetic Data Acquisition, Processing and Interpretation’ यानी 2डी ब्रॉडबैंड समुद्री भूकंपीय और गुरुत्व-चुंबकीय डेटा अधिग्रहण, प्रसंस्करण और व्याख्या कहा जाता है. आसान भाषा में समझें तो भारत समुद्र की गहराई के नीचे एक विशाल स्कैनिंग अभियान चलाने जा रहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि करोड़ों साल पुरानी चट्टानों और मिट्टी की परतों के नीचे कहां तेल और गैस के भंडार छिपे हो सकते हैं.

क्या यह समुद्री सर्वे अभियान भारत की ऊर्जा आयात पर निर्भरता को अगले पांच वर्षों में कम कर पाएगा?

  • Aबहुत अधिक संभावना है
  • Bकुछ हद तक संभव है
  • Cबहुत कम संभावना है
  • Dकोई प्रभाव नहीं होगा

इस परियोजना का आकार बेहद बड़ा है. केवल बंगाल-पूर्णिया और महानदी बेसिन में ही 45,000 लाइन किलोमीटर का सर्वे होगा. अंडमान बेसिन में 43,000 लाइन किलोमीटर, कृष्णा-गोदावरी बेसिन में 43,000 लाइन किलोमीटर और कावेरी बेसिन में 30,000 लाइन किलोमीटर का सर्वे किया जाएगा. कुल मिलाकर लाखों किलोमीटर तक फैला यह सर्वे करीब दो साल तक चलेगा.

कितना अहम यह मिशन?

इस मिशन की अहमियत समझने के लिए भारत के ऊर्जा आयात को देखना जरूरी है. भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. प्राकृतिक गैस की जरूरतों का बड़ा हिस्सा भी आयात से पूरा होता है. ऐसे में दुनिया में कहीं भी युद्ध, तेल संकट या भू-राजनीतिक तनाव होता है तो उसका सीधा असर भारत पर पड़ता है. पश्चिम एशिया में तनाव और अमेरिका-ईरान युद्ध ने एक बार फिर भारत की इस कमजोरी को उजागर किया है.

सरकार अब इसी निर्भरता को कम करना चाहती है. अधिकारियों के मुताबिक, भारत का पूर्वी समुद्री क्षेत्र अभी भी पश्चिमी तट के मुंबई हाई जैसे इलाकों की तुलना में काफी कम खोजा गया है. गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस मिलने की संभावना तो है, लेकिन आधुनिक तकनीक से उनकी पर्याप्त मैपिंग नहीं हुई है.

कैसे होगा इतना बड़ा सर्वे?

इसी वजह से यह नया सर्वे बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. विशेष सर्वे जहाज अपने पीछे लंबे केबल जैसे उपकरण खींचेंगे, जिन्हें ‘स्ट्रीमर’ कहा जाता है. ये उपकरण समुद्र की तह में शक्तिशाली ध्वनि तरंगें भेजेंगे और फिर नीचे की चट्टानों से लौटने वाली आवाजों को रिकॉर्ड करेंगे. वैज्ञानिक इस डेटा का विश्लेषण कर समुद्र तल के कई किलोमीटर नीचे की तस्वीर तैयार करेंगे.

इसका मुख्य उद्देश्य उन संरचनाओं की पहचान करना है, जहां तेल और गैस फंसी हो सकती है. सरकारी दस्तावेजों में कहा गया है कि यह सर्वे ‘टेक्टॉनिक सेटअप, बेसमेंट कॉन्फिगरेशन और डिपोजिशनल पैटर्न’ को समझने के लिए किया जा रहा है, ताकि संभावित हाइड्रोकार्बन क्षेत्रों की पहचान की जा सके.

कहां-कहां तेल और गैंस भंडार मिलने की उम्मीद?

सरल शब्दों में कहें तो भारत यह जानना चाहता है कि अगला बड़ा तेल और गैस भंडार कहां मिल सकता है. शुरुआती संकेत काफी सकारात्मक बताए जा रहे हैं. बंगाल ऑफशोर बेसिन में 10 किलोमीटर से ज्यादा मोटी तलछटी परतें मौजूद हैं. यहां ईओसीन काल से लेकर हाल के भूवैज्ञानिक दौर तक हाइड्रोकार्बन मिलने की संभावना जताई गई है. पूर्व-मध्य क्षेत्र में मौजूद मायोसीन काल की परतों को बड़े लक्ष्य के रूप में देखा जा रहा है. कई जगहों पर गैस के संकेत भी मिले हैं.

महानदी बेसिन को भी काफी अहम माना जा रहा है. अधिकारियों का कहना है कि यहां व्यावसायिक स्तर पर तेल और गैस उत्पादन की क्षमता मौजूद है. यहां प्लायोसीन से लेकर क्रेटेशियस काल तक कई संभावित हाइड्रोकार्बन क्षेत्र हैं. गहरे समुद्री गैस भंडार और जैविक गैस सिस्टम को बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है.

अंडमान बेसिन पर सबसे ज्यादा ध्यान?

सबसे ज्यादा रणनीतिक महत्व अंडमान बेसिन को दिया जा रहा है. ऊर्जा विशेषज्ञ लंबे समय से मानते रहे हैं कि अंडमान समुद्री क्षेत्र में भारी मात्रा में गैस भंडार हो सकते हैं, क्योंकि इसकी भूगर्भीय संरचना म्यांमार और इंडोनेशिया के गैस क्षेत्रों से मिलती-जुलती है. सरकारी दस्तावेजों में भी खास तौ से कहा गया है कि अंडमान क्षेत्र में मायोसीन काल की संरचनाओं में बड़ी गैस खोज की संभावना है.

इन दस्तावेजों में ‘गैस हाइड्रेट्स’ का भी जिक्र है. यह समुद्र की तह के नीचे जमा जमी हुई मीथेन गैस होती है, जिसे भविष्य का बड़ा ऊर्जा स्रोत माना जा रहा है.

इसके अलावा कृष्णा-गोदावरी बेसिन पहले से ही भारत का बड़ा गैस उत्पादक क्षेत्र है, लेकिन नए सर्वे से उम्मीद जताई जा रही है कि गहरे समुद्री हिस्सों में अब भी बड़े भंडार छिपे हो सकते हैं. यहां गहरे समुद्री संरचनाएं और चट्टानी परतें मौजूद हैं, जहां भारी मात्रा में तेल और गैस मिलने की संभावना है.

कावेरी बेसिन से और बड़ी उम्मीद?

कावेरी बेसिन भी भारत के पुराने तेल उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है. यहां पहले से उत्पादन हो रहा है, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि गहरे समुद्री हिस्सों और जुरासिक काल की परतों में अब भी बड़े भंडार मौजूद हो सकते हैं.

हालांकि यह परियोजना सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं है. इसके पीछे एक बड़ा रणनीतिक संदेश भी छिपा है. दुनिया में तेजी से बदलती ऊर्जा राजनीति के बीच भारत अपने हर संभावित घरेलू ऊर्जा स्रोत को सुरक्षित करना चाहता है. रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में अस्थिरता और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारत को यह एहसास कराया है कि लंबे समय की ऊर्जा सुरक्षा बेहद जरूरी है.

अगर घरेलू उत्पादन बढ़ता है तो सरकार को वैश्विक संकटों के दौरान राहत मिल सकती है. बंगाल की खाड़ी के नीचे, समुद्र तल से कई किलोमीटर गहराई में भारत को उम्मीद है कि अब भी बड़े ऊर्जा भंडार छिपे हुए हैं. आने वाला यह सर्वे उसी रहस्य से पर्दा उठाने की कोशिश होगा.