Assam Assembly Election 2026: असम विधानसभा चुनाव 2026 के लिए राजनीतिक पारा अपने चरम पर पहुंच गया है। मंगलवार, 31 मार्च को भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने गुवाहाटी में अपना ‘संकल्प पत्र’ (चुनावी घोषणापत्र) जारी कर वादों की झड़ी लगा दी है।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल की मौजूदगी में जारी इस घोषणापत्र में राज्य के भविष्य के लिए कई बड़े और कड़े फैसले लेने का वादा किया गया है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने स्पष्ट किया कि भाजपा का लक्ष्य असम को देश का सबसे सुरक्षित और विकसित राज्य बनाना है। लेकिन इस बार मुकाबला सिर्फ वादों और विकास के दावों तक सीमित नहीं है, बल्कि असली खेल वोट बैंक और जातीय समीकरण का है, जो तय करेगा कि सत्ता किसके हाथ में जाएगी।
घोषणापत्र जारी करते हुए मुख्यमंत्री सरमा ने कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं, जो राज्य की राजनीति की दिशा बदल सकती हैं:
समान नागरिक संहिता (UCC): भाजपा ने वादा किया है कि सत्ता में आने पर असम में UCC लागू किया जाएगा। हालांकि, छठी अनुसूची (Sixth Schedule) और अनुसूचित जनजाति (ST) क्षेत्रों को इससे बाहर रखा जाएगा।
लव जिहाद पर लगाम: मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘लव जिहाद’ के खिलाफ राज्य में बेहद कड़े कदम उठाए जाएंगे और नया कानून लाया जाएगा।
रोजगार का वादा: अगले 5 सालों में राज्य के युवाओं के लिए 2 लाख सरकारी नौकरियां देने का संकल्प लिया गया है।
बाढ़ मुक्त असम: असम की सबसे बड़ी समस्या ‘बाढ़’ से निपटने के लिए पहले दो वर्षों में 18,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
शिक्षा और स्वास्थ्य: ‘एक जिला, एक मेडिकल कॉलेज’, ‘एक विश्वविद्यालय’ और ‘एक इंजीनियरिंग कॉलेज’ के विजन पर काम होगा।
चाय बागान श्रमिकों को हक: 4.5 लाख चाय बागान श्रमिक परिवारों को पहली बार भूमि पट्टा (Land Patta) दिया गया है और इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा।
बुनियादी ढांचा: ब्रह्मपुत्र नदी पर कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए नए पुलों का जाल बिछाया जाएगा।
सुरक्षित असम: राज्य की सीमाओं को सुरक्षित करने और घुसपैठ पर पूरी तरह लगाम लगाने का वादा।
आर्थिक विकास: असम को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए एक उन्नत इकोसिस्टम तैयार करना।
असम के चुनावी मैदान में क्या है भाजपा की रणनीति?
बीजेपी ने इस चुनाव में अपनी रणनीति को काफी स्पष्ट रखा है। पार्टी विकास और “डबल इंजन सरकार” के मॉडल को सामने रख रही है, लेकिन इसके साथ ही पहचान की राजनीति को भी मजबूती से जोड़ रही है। यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC), लव जिहाद जैसे मुद्दों के जरिए बीजेपी असमिया हिंदू वोटरों को एकजुट करने की कोशिश में है। वहीं, चाय बागान मजदूरों और जनजातीय समुदायों के बीच पिछले कुछ सालों में पार्टी ने अपनी पकड़ मजबूत की है, जो कई सीटों पर निर्णायक साबित हो सकती है।
दूसरी तरफ कांग्रेस की रणनीति बीजेपी से अलग है। कांग्रेस इस बार असंतोष को हवा देने और अपने पारंपरिक वोट बैंक को फिर से मजबूत करने पर ध्यान दे रही है। खासतौर पर अल्पसंख्यक वोटर्स, ग्रामीण आबादी और बेरोजगारी से परेशान युवाओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश हो रही है। कांग्रेस को उम्मीद है कि अगर मुस्लिम वोट एकजुट रहता है और छोटे दलों में बंटता नहीं है, तो वह कई सीटों पर बीजेपी को कड़ी टक्कर दे सकती है।
क्या है इस बार का जातीय और सामाजिक समीकरण?
असम की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से अहम रहे हैं और इस बार भी तस्वीर कुछ अलग नहीं है। राज्य में मुस्लिम आबादी करीब 30-35 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है, जो चुनाव में बड़ा फैक्टर है। अगर यह वोट एकजुट होकर कांग्रेस के पक्ष में जाता है, तो चुनाव का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है। लेकिन अगर यह वोट अलग-अलग दलों में बंटता है, तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलता है।
वहीं असमिया हिंदू वोट बीजेपी का मजबूत आधार बन चुका है, जिसे पार्टी अपने वैचारिक मुद्दों के जरिए और मजबूत करने में जुटी है। इसके अलावा चाय बागान मजदूर, जिन्हें ‘टी ट्राइब्स’ कहा जाता है करीब 35-40 सीटों पर असर डालते हैं। पिछले कुछ चुनावों में इस वर्ग का झुकाव बीजेपी की ओर देखा गया है और अगर यह ट्रेंड जारी रहता है, तो बीजेपी को बड़ा फायदा मिल सकता है।
जनजातीय और बोडो समुदाय भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगे। इन इलाकों में क्षेत्रीय दलों और NDA के सहयोगियों के साथ गठबंधन के कारण बीजेपी को बढ़त मिलती दिख रही है। वहीं बंगाली हिंदू वोटर्स खासकर NRC और नागरिकता से जुड़े मुद्दों के बाद, बीजेपी के साथ मजबूती से खड़े नजर आते हैं।
इस पूरे चुनावी समीकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस अपने वोट बैंक को एकजुट रख पाएगी, या फिर वोटों का बंटवारा बीजेपी के लिए रास्ता आसान कर देगा। अब सबकी नजर 9 अप्रैल की वोटिंग और 4 मई के नतीजों पर टिकी है, जो तय करेंगे कि असम में सत्ता की चाबी किसके हाथ में जाएगी।



