रूस के लीक हुए मेमो से नई राजनीतिक स्थिति
दुनिया यूक्रेन के डीडोलाइजेशन और ब्रिक्स की राजनीति में उलझी हुई है, जबकि भारत अपनी रणनीति को चुपचाप तैयार कर रहा है। हाल ही में एक महत्वपूर्ण विकास सामने आया है।
रूस का एक कथित आंतरिक मेमो लीक हुआ है, जिसमें कहा गया है कि युद्ध के बाद रूस डॉलर प्रणाली में वापस लौटने की योजना बना रहा है, और यह अमेरिका के साथ बड़े ऊर्जा सौदों के बदले हो सकता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, एक रूसी रणनीतिक दस्तावेज में अमेरिका और रूस के बीच आर्थिक सहयोग की संभावनाओं का उल्लेख किया गया है, बशर्ते यूक्रेन युद्ध रूस की शर्तों पर समाप्त हो। यह संकेत दिया गया है कि रूस डॉलर सेटलमेंट प्रणाली में वापसी कर सकता है, और ऊर्जा व्यापार डॉलर में होगा। अमेरिकी कंपनियों को तेल और एलएनजी उत्पादों में प्रवेश मिल सकता है, और आर्कटिक तथा साइबेरिया के क्षेत्रों को खोला जा सकता है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2022 के बाद रूस ने डॉलर से दूरी बनाकर युवान और रुपये में व्यापार बढ़ाया था।
ऊर्जा बाजार में संभावित बदलाव
यदि आप विश्व के प्रमुख तेल उत्पादकों पर नजर डालें, तो अमेरिका और रूस शीर्ष पर हैं। दोनों देशों का वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा प्रभाव है। यदि ये देश प्रतिस्पर्धा के बजाय साझेदारी में आते हैं, तो इसका प्रभाव कितना बड़ा होगा, इसकी कल्पना करें। रिपोर्ट में कहा गया है कि रूस अब सस्ता तेल चीन को देने के बजाय वैश्विक बाजार में डॉलर में बेचेगा। यदि ऐसा होता है, तो रूसी तेल पर छूट समाप्त हो जाएगी और चीन को सस्ती ऊर्जा का लाभ नहीं मिलेगा। इससे डॉलर को नई ताकत मिलेगी। भारत के संदर्भ में, जब अमेरिका-भारत व्यापार समझौते की चर्चा चल रही थी, तब रूसी तेल पर अमेरिका का दबाव एक बड़ा मुद्दा था, लेकिन भारत ने कभी आधिकारिक रूप से यह नहीं कहा कि वह रूसी तेल खरीदना बंद करेगा।
भारत की नीति और रूस का संभावित बदलाव
भारत का रुख स्पष्ट था कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार खरीदारी करेगा। यदि रूस अब डॉलर प्रणाली में लौटता है और छूट समाप्त करता है, तो भारत की नीति में कोई बदलाव नहीं होगा। इसका मतलब है कि भारत ने अपने विकल्प खुले रखे हैं, जो एक परिपक्व रणनीति है। 2022 के बाद रूस और चीन के बीच संबंध मजबूत हुए, जिससे चीन को सस्ता रूसी तेल मिला और युवान का अंतरराष्ट्रीयकरण बढ़ा। लेकिन यदि रूस फिर से डॉलर प्रणाली में लौटता है, तो चीन का सस्ता ऊर्जा मॉडल कमजोर हो जाएगा, और युवान की गति धीमी हो जाएगी। ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग का लाभ भी प्रभावित हो सकता है, क्योंकि चीन ने ईवी, सौर और बैटरी क्षेत्रों में भारी निवेश किया है। यदि जीवाश्म ईंधन सस्ता और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता है, तो ग्रीन ट्रांजिशन की गति धीमी हो सकती है।



