भारत और यूएई साउथ एशिया और मिडिल ईस्ट के पावर बैलेंस पर भी एक दूसरे के रणनीतिक सहयोगी बनने को तैयार हैं और इस वक्त मिडिल ईस्ट पर असर डालने वाली सबसे बड़ी हलचल इस्लामिक NATO की परिकल्पना है, जिस पर पाकिस्तान सऊदी अरब और तुर्किए ये तीनों मुस्लिम देश काफी आगे बढ़ चुके हैं.
क्या यूएई के साथ भारत बनाएगा सेक्युलर नाटो?
अब यूएई के राष्ट्रपति के भारत दौरे के बीच एक सवाल और उठ रहा है. जिन देशों के हित इस इस्लामिक नेटो से प्रभावित हो सकते हैं, क्या वो इससे निपटने की कोई तैयारी कर रहे हैं. हमने आपको भारत और यूएई के रणनीतिक सहयोग की जानकारी दी लेकिन क्या भारत और यूएई भी अपना NATO यानी सैन्य गठबंधन बना सकते हैं? और इस्लामिक NATO को काउंटर करने के लिए अगर कोई सेक्युलर NATO बना तो उसमें इस क्षेत्र के कौन कौन से देश शामिल हो सकते हैं. आज हम आपको यही बताने जा रहे हैं.
विशेषज्ञ मानते हैं कि परमाणु बम रखने वाले पाकिस्तान तकनीक में आगे तुर्किए और ऑयल रिच इकोनॉमी वाले सऊदी के संभावित सैन्य गठबंधन, जिसे इस्लामिक NATO कहा जा रहा है उसका तोड़ भारत यूएई और इजरायल का सेक्युलर सैन्य गठबंधन हो सकता है. भारत के यूएई और इजरायल के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत हैं. लेकिन मिडिल ईस्ट में यूएई ही वो असरदार देश है,जो इजरायल के करीब है. कैसे हाल के दिनों में यूएई और इजरायल की साझेदारी मजबूत हुई है. चलिए अब वो समझाते हैं.
दोनों देश ईरान के मिसाइल, ड्रोन नेटवर्क और इस्लामिक आतंकी संगठनों से खतरे को लेकर खुफिया जानकारी साझा कर रहे हैं.
दोनों देशों के बीच 2020 से पहले द्विपक्षीय व्यापार लगभग शून्य था, जो 2023-24 में 2.5 अरब डॉलर के आसपास पहुंच गया.
2020 में Abraham Accords के बाद दोनों देशों के दूतावास खुले. सीधी उड़ानें शुरू हुईं.पर्यटन और व्यापार तेज हुआ.
UAE के तेल टर्मिनल, बंदरगाह, एयरपोर्ट जैसी अहम जगहों की साइबर सुरक्षा में इजरायली तकनीक उपयोगी साबित हुईं.
दोनों देशों के बीच ड्रोन-रोधी सिस्टम और एयर डिफेंस पर तालमेल हुआ है.
इसके अलावा गाजा में इजराइल-हमास युद्ध के बीच यूएई इजरायल का मददगार बना था. एक खुफिया दस्तावेज के आधार पर दावा किया गया था कि UAE ने इजराइल को सीधे सैन्य, खुफिया और लॉजिस्टिक सहायता देने की योजना बनाई थी. ये UAE और इजराइल के बीच अब तक के सबसे प्रत्यक्ष सैन्य सहयोग को उजागर करता है. दोनों देश धर्म से ज्यादा हित पर आधारित नीति चाहते हैं. Turkey-Qatar के मुस्लिम ब्रदरहुड विचार को पसंद नहीं करते, मिडिल ईस्ट में एक संतुलन बनाना चाहते हैं. यानी और करीब आ सकते हैं.
अब आप समझिए कि संभावित इस्लामिक नेटो के खिलाफ अगर भारत-यूएई और इजरायल का सेकुलर नेटो आकार लेता है ? तो दक्षिण एशिया और मिडिल ईस्ट में शक्ति संतुलन किस तरफ झुकेगा.
आर्थिक शक्ति की बात करें तो भारत यूएई और इजरायल की संयुक्त इकोनॉमी 5.6 ट्रिलियन डॉलर है और संभावित इस्लामिक नाटो यानी तुर्किए पाकिस्तान और सउदी की संयुक्त इकोनॉमी 2.9 ट्रिलियन डॉलर है यानी भारत यूएई इजरायल के आधे से कम.
संभावित सेकुलर नेटो के पास 1 हजार 150 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा मंडार है, जबकि इस्लामिक नेटो के पास 615 अरब डॉलर का.
भारत-इजरायल और यूएई के पास 16 लाख 85 हजार सक्रिय सैनिक हैं, जबकि इस्लामिक नेटो के पास 13 लाख 6 हजार.
संभावित सेकुलर नेटो के पास 1 हजार से ज्यादा लड़ाकू विमान हैं, जिसमें इजरायल के पांचवी पीढ़ी के एफ 35 जैसे आधुनिक फाइटर जेट भी शामिल हैं. जबकि इस्लामिक नेटो के पास सिर्फ 900.
भारत इजरायल और यूएई के संभावित गठबंधन में भारत के पास 2 एयरक्राफ्ट कैरियर है जबकि इस्लामिक नेटो के पास एक भी नहीं.
सेकुलर नेटो के पास 300 से ज्यादा युद्धपोत हैं, जबकि इस्लामिक नेटो के पास सिर्फ 200.
परमाणु हथियारों की संख्या में भी सेकुलर नेटो मजबूत है. भारत और इजरायल के पास 300 से ज्यादा परमाणु हथियार हैं. जबकि इस्लामिक नेटो में सिर्फ पाकिस्तान के पास 165 परमाणु हथियार हैं.
संभावित सेकुलर नेटो का रक्षा बजट 140 अरब डॉलर है जबकि इस्लामिक नेटो का संयुक्त रक्षा बजट 110 अरब डॉलर है. यानी इस्लामिक नेटो…सेकुलर नेटो के सामने नहीं टिकेगा.
इसके अलावा तकनीक समुद्री, ताकत स्थायी, इकोनॉमी सेकुलर नेटो के लगातार मजबूत होने की गारंटी हैं. दूसरी तरफ इस्लामिक नेटो में पाकिस्तान और तुर्किए की आर्थिक स्थिति अस्थिर है.
इसी के साथ मिडिल ईस्ट के बहरीन, इजिप्ट, जॉर्डन, मोरक्को, और ओमान जैसे देश भी तुर्किए और पाकिस्तान से वैचारिक दूरी की वजह से संभावित सेकुलर नेटो के साथ आ सकते हैं. जबकि तुर्किए के विरोधी ग्रीस और साइप्रस इजरायल से समझौता कर चुके हैं.
अब जिस तरह इस्लामिक नेटो का शोर तेज हो रहा है. उसके जवाब में सेकुलर नेटो की चर्चा भी तेज हो रही है, जिसे यूएई के राष्ट्रपति के दौरे ने और मजबूत किया है.



