पूर्वी हिमालय में स्थित चुम्बी वैली को हिमालयन सिल्क रूट वैली कहा जाता है. यह घाटी प्राचीन सिल्क रूट का अहम हिस्सा थी. यह रास्ता भारत को तिब्बत और चीन से जोड़ता था.
इसी मार्ग से होकर रेशम, नमक, ऊन, चाय और मसालों का कारोबार होता था. इसके साथ-साथ अलग-अलग सभ्यताओं के लोग भी एक-दूसरे के संपर्क में आए थे.
कहां स्थित है चुम्बी वैली
चुम्बी वैली सिक्किम, भूटान और तिब्बत के बीच स्थित है. यह चारों तरफ से ऊंचे हिमालयी पहाड़ों से घिरी हुई है. यही घाटी भारतीय उपमहाद्वीप को तिब्बती पठार से जोड़ती है. यह एसी जगह पर है कि ये बिल्कुल प्राकृतिक रूप से एक प्रवेश द्वार की तरह काम करती है.
क्यों कहते हैं हिमालयन सिल्क रूट वैली
पुराने समय में सिल्क रूट का एक अहम हिस्सा इसी घाटी से होकर जाता था. व्यापारी इसी रास्ते से अपने माल के साथ लंबी यात्राएं करते थे. यह घाटी भारत, तिब्बत और चीन के बीच व्यापार और आपसी संबंधों की रीढ़ मानी जाती थी. यही कारण है कि इसे हिमालयन सिल्क रूट वैली का नाम मिल गया.
बता दें कि इस घाटी से होकर रेशम, नमक, ऊन, चाय, मसाले और कीमती पत्थरों का व्यापार होता था. इन चीजों की मांग दूर-दूर तक थी. इससे अलग-अलग इलाकों के बीच आर्थिक रिश्ते मजबूत हुए और लोगों की जीवनशैली पर भी असर पड़ा था.
नाथू ला पास की भूमिका
चुम्बी वैली में स्थित नाथू ला पास तिब्बत में जाने का बड़ा रास्ता रहा है. यह पास सिल्क रूट का मुख्य प्रवेश द्वार माना जाता था. आज भी यह इलाका व्यापार और सुरक्षा के लिहाज से काफी अहम है. चुम्बी वैली हिमालय में एक छोटा और सुरक्षित रास्ता देती थी. इसी वजह से यह व्यापार, बातचीत और सुरक्षा के नजरिये से काफी अहम मानी जाती थी. इसकी सीमा कई देशों से लगती है इसलिए आज भी इसका भू-राजनीतिक महत्व बना हुआ है.
संस्कृति और धर्म का रास्ता
यह घाटी सिर्फ सामान की आवाजाही तक सीमित नहीं थी. इसी रास्ते से धर्म, कला और विचार भी एक जगह से दूसरी जगह पहुंचे थे. बौद्ध धर्म के फैलाव में भी इन हिमालयी रास्तों की बड़ी भूमिका रही है.



