दिल्ली में बिना गठबंधन के चुनाव लड़ने के कारण कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों को नुकसान हुआ। पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी और अस्पष्ट नीतियों ने उत्साह को कमजोर किया।
बीते लोकसभा चुनाव में सीटें बढ़कर 99 तक पहुंच गई तो कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी पूरे जोश में दिखे। ऐसा लगा कि 10 वर्ष बाद विपक्ष मोदी सरकार को ठीकठाक घेरने की ताकत में आई है। लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी लोकसभा चुनावों मिली सफलता के सिलसिले को आगे नहीं बढ़ा पाई। पहले हरियाणा, फिर महाराष्ट्र में हार के बाद दिल्ली में दिखी उलझन ने कांग्रेस के अंदर की बड़ी खामी की तरफ इशारा किया है। देश की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्स्प्रेस की वेबसाइट पर प्रकाशित एक लेख में कांग्रेस के हालात का सटीक विश्लेषण किया है। नीचे उनका लेख है ज्यों का त्यों दिया गया है।
कांग्रेस पार्टी की रफ्तार धीमी पड़ने लगी है। इस बात पर एक राजनीतिक पंडित ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘इसमें नया क्या है?’ जून 2024 में पार्टी ने जोर पकड़ा था। 17वीं लोकसभा में कांग्रेस की सीटें लगभग दोगुनी हो गई थीं। 52 से बढ़कर 99 सीटें जीत ली थीं पार्टी ने। खास बात यह थी कि बीजेपी 240 सीटों पर सिमट गई। बहुमत से कम सीटें होने के कारण भाजपा को सहयोगियों के साथ सरकार बनानी पड़ी। 543 सदस्यों वाले सदन में 99 सीटें कोई बड़ी संख्या नहीं है। लेकिन यह कांग्रेस के पक्ष में बढ़ते जनाधार का संकेत जरूर था।