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भारत में कहां-कहां होती है अफीम की खेती? अफीम के खेत की अलॉटमेंट कैसे मिलती है?

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अफीम से मॉर्फिन और कोडीन जैसी जरूरी दवाएं बनाई जाती हैं, जिनका यूज गंभीर दर्द और कई मेडिकल जरूरतों में होता है…

अफीम की खेती कोई सामान्य खेती नहीं है.

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां सरकार की निगरानी में कानूनी तरीके से अफीम की खेती की जाती है. भारत ही ऐसा देश माना जाता है जहां कानूनी रूप से अफीम गोंद (Opium Gum) का प्रोडक्शन किया जाता है. इसी अफीम से मॉर्फिन और कोडीन जैसी जरूरी दवाएं बनाई जाती हैं, जिनका यूज गंभीर दर्द और कई मेडिकल जरूरतों में होता है, हालांकि अफीम की खेती कोई सामान्य खेती नहीं है.

इसके लिए सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता है और बेहद सख्त नियमों का पालन करना होता है. बिना अनुमति अगर कोई किसान अफीम का एक पौधा भी उगा दे, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है. यही वजह है कि अफीम की खेती को लेकर लोगों के मन में कई तरह के सवाल बने रहते हैं कि  आखिर इसकी अलॉटमेंट कैसे होती है, कौन किसान इसकी खेती कर सकता है और इसमें कमाई कितनी होती है. तो आइए जानते हैं कि अफीम के खेत की अलॉटमेंट कैसे मिलती है और किन कागजों की जरूरत पड़ती है.

भारत में कहांकहां होती है अफीम की खेती?

भारत में अफीम की खेती हर राज्य में नहीं की जा सकती है. केंद्र सरकार हर साल कुछ तय इलाकों को ही इसकी अनुमति देती है फिलहाल मुख्य रूप से तीन राज्यों में अफीम की खेती की इजाजत दी जाती है. यह तीन राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश है. राजस्थान के झालावाड़, चित्तौड़गढ़, कोटा, भीलवाड़ा, प्रतापगढ़ और उदयपुर जैसे इलाके अफीम खेती के लिए काफी प्रसिद्ध है. वहीं मध्य प्रदेश के मंदसौर और नीमच जिले भी अफीम उत्पादन के बड़े केंद्र माने जाते हैं. उत्तर प्रदेश में भी कुछ सीमित इलाकों में इसकी खेती होती है.

अफीम के खेत की अलॉटमेंट कैसे मिलती है?

अफीम की खेती करने के लिए किसान को सरकार से लाइसेंस लेना जरूरी होता है. यह लाइसेंस बहुत सीमित संख्या में जारी किए जाते हैं. ज्यादातर मामलों में पुराने किसानों के लाइसेंस ही रिन्यू किए जाते हैं. नए लाइसेंस बहुत कम दिए जाते हैं. अगर किसी किसान की मृत्यु हो जाती है, तो नियमों के अनुसार उसका लाइसेंस परिवार के कानूनी वारिस को ट्रांसफर किया जा सकता है. इसके लिए भी सरकारी जांच और डॉक्यूमेंट्स की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है.  सरकार खेती के लिए खेत का क्षेत्रफल भी पहले से तय करती है. किसान जितनी जमीन के लिए अनुमति पाता है, उतनी ही जमीन पर खेती कर सकता है.

अफीम की खेती की अनुमति कौन देता है?

अफीम की खेती का पूरा नियंत्रण केंद्र सरकार के पास होता है. इसकी निगरानी वित्त मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाला सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स (CBN) करता है. इसका मुख्य कार्यालय मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित है. हर साल सरकार अफीम नीति जारी करती है, जिसमें यह तय किया जाता है कि किन इलाकों में खेती होगी, कितने किसानों को लाइसेंस मिलेगा और प्रोडक्शन से जुड़े नियम क्या होंगे.

अफीम की खेती के लिए किन किन कागजों की जरूरत पड़ती है?

अफीम खेती का लाइसेंस पाने के लिए किसानों को कई जरूरी कागजात जमा करने पड़ते हैं. इनमें आमतौर पर आधार कार्ड, पहचान पत्र, जमीन के दस्तावेज, खसरा-खतौनी, निवास प्रमाण पत्रॉ, बैंक खाता विवरण, पासपोर्ट साइज फोटो और पुराना लाइसेंस शामिल होते हैं. इसके अलावा अधिकारियों के तहत खेत की जांच भी की जाती है जिससे यह तय हो सके कि खेती तय नियमों के अनुसार हो रही है.

अफीम की खेती कैसे की जाती है?

अफीम की खेती ठंड के मौसम में की जाती है. इसकी बुवाई आमतौर पर अक्टूबर और नवंबर के बीच होती है. किसान पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करते हैं और उसमें गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट डालते हैं. करीब 3 से 4 महीने बाद पौधों में फूल आने लगते हैं. फूल झड़ने के बाद डोडे तैयार होते हैं. इन डोडों पर हल्का चीरा लगाया जाता है, जिससे सफेद रंग का तरल निकलता है.यही तरल बाद में जमकर अफीम बनता है फिर इस जमे हुए पदार्थ को इकट्ठा किया जाता है. यह प्रक्रिया कई दिनों तक दोहराई जाती है. बाद में सरकार किसानों से अफीम खरीदती है.

अफीम की खेती में क्याक्या नियम होते हैं?

अफीम की खेती करने वाले किसानों को कई सख्त नियमों का पालन करना पड़ता है. जिसमें तय सीमा से ज्यादा जमीन पर खेती नहीं कर सकते हैं. इसके अलावा पूरी उपज सरकार को ही देनी होती है. साथ ही फसल खराब होने पर तुरंत सूचना देनी होती है और खेत की नियमित जांच होती है. वहीं अवैध बिक्री करने पर सख्त कार्रवाई होती है. अगर कोई किसान नियम तोड़ता है, तो उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है.