बजट का काउंटडाउन शुरू हो गया है. 1 फरवरी रविवार के दिन वित्त मंत्री बजट का ऐलान करेंगे. लेकिन इस बार बजट कुछ खास होने जा रहा है. इस बार बजट में ट्रंप के टैरिफ की हवा पूरी तरह से निकालने की तैयारी की जा रही है.
बजट में इस बार सरकार विदेशी सामानों के लिए अपने दरवाजे खोलने जा रही है. ताकि घरेलू सप्लाई चेन को मजबूती मिलेगी.
साथ ही इनपुट कॉस्ट को कम करने का प्रयास जाएगा. हालांकि फॉरेन प्रोडक्ट्स की आसान एंट्री से लोकल प्रोडक्ट्स की सेल्स में असर देखने को मिल सकता है. लेकिन ये कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ में भारी वृद्धि की है और दुनिया वैकल्पिक बाजारों की तलाश कर रही है.
जानकारों की मानें तो ये एक तरह से डिफेंसिव रुख है, लेकिन इसे एक रिस्क फ्री रणनीति का हिस्सा है जिसका उद्देश्य ऐसे सप्लायर्स पर से निर्भरता को कम करना है, जो भारत के केंद्र में हमेशा से रही है. साथ ही असुरक्षित ट्रेड चैनल्स पर डिपेंडेंसी को कम करना और व्यवधान को लाभ में बदलना है.
ट्रंप के टैरिफ प्रोग्राम, जिसमें अमेरिका में भारतीय आयात पर 26 फीसदी तक के रेसीप्रोकल टैरिफ शामिल हैं, ने निर्यातकों को झकझोर दिया है और एक ऐसे रिश्ते में नई परेशानियां पैदा कर दी हैं जो ऐतिहासिक रूप से मजबूत सर्विस और गुड्स ट्रेड संबंधों पर आधारित रहा है.
वहीं मौजूदा मोदी सरकार ने जवाबी कार्रवाई करने के बजाय, अपनी रणनीति में बदलाव किया है. चुनिंदा विदेशी उत्पादों पर अपना बाज़ार रुख नरम कर रही है और ऐसे ट्रेडिंग पार्टनर्स को आकर्षित कर रही है जो ग्लोबल सप्लाई चेन को नया रूप दे सकते हैं. आलोचक इसे रिस्क मैनेज्मेंट कहते हैं, जबकि कई लोग इसे रणनीतिक कूटनीति मानते हैं. आइए आपको भी इसके बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं.
ट्रेड स्ट्रैटिजी में बदलाव
सरकार को अपना अगला बजट तैयार करते समय, पॉलिसी मेकर्स को एक नाजुक संतुलन स्थापित करना होगा, जिसमें अमेरिकी टैरिफ वृद्धि से उत्पन्न बाहरी झटकों से इकोनॉमी को बचाना, साथ ही निवेशकों का विश्वास बनाए रखने के लिए सरकारी निवेश शामिल है. यह संतुलन घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करने वाले विदेशी सामानों के लिए चुनिंदा रूप से अपने कारखानों के द्वार खोलने की भारत की व्यापक रणनीति का केंद्र बन गया है.
भारत फिस्कल कंसोलिडेशन पर पहले ही काफी आगे बढ़ चुका है. आधिकारिक बजट दस्तावेजों के अनुसार, केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2021 में महामारी के चरम पर पहुंचे सकल घरेलू उत्पाद के 9.2 फीसदी के फिस्कल डेफिसिट को वित्त वर्ष 2024 में घटाकर 5.6 फीसदी कर दिया है, और वित्त वर्ष 2026 तक इसे 4.5 फीसदी तक लाने का लक्ष्य रखा है.
बजट से सेलेक्टिव ट्रेड ओपननेस में गेटकीपिंग रोल निभाने की भी उम्मीद है. जिसके तहत महत्वपूर्ण कैपिटल गुड्स, इंटीमिडिएट इनपुट और एडवांस मशीनरी पर कम शुल्क लगाने की उम्मीद है और रणनीतिक रूप से संवेदनशील सेक्टर्स की सुरक्षा भी की जाएगी. प्राइस वाटरहाउस एंड कंपनी एलएलपी के प्रिंसिपल गौतम खट्टर ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि बजट में इनपुट कॉस्ट को कम करने और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को समर्थन देने के लिए कच्चे माल/मध्यवर्ती वस्तुओं पर लक्षित टैरिफ रिफॉर्म और कैलिब्रेटेड शुल्क कटौती पर विचार किया जा सकता है, जबकि कई तैयार उत्पादों पर सामान्य रूप से सुरक्षात्मक रुख बरकरार रखा जाएगा.
अमेरिकी टैरिफ का असर
अमेरिका द्वारा हाल ही में लगाए गए टैरिफ उपायों का लक्ष्य स्टील और कैमिकल्स से लेकर वस्त्र और इंजीनियरिंग कंपोनेट्स तक, भारतीय निर्यात की एक विस्तृत चेन है, जिससे अमेरिकी बाजार में प्रमुख भारतीय उत्पादों की पहुंच की कॉस्ट प्रभावी रूप से बढ़ गई है.
फिर भी, इसका प्रभाव स्पष्ट होते हुए भी, आशंकाओं की तुलना में उतना विनाशकारी नहीं रहा है. इन चुनौतियों और टैरिफ दबावों के बावजूद भारत का निर्यात प्रदर्शन उल्लेखनीय रूप से लचीला बना हुआ है.
इस लचीलेपन का अधिकांश श्रेय निर्यातकों द्वारा नए रूट्स और बाजारों की खोज को जाता है, क्योंकि कंपनियां पारंपरिक अमेरिकी मांग से अलग अपनी उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश कर रही हैं और मजबूत विकास पूर्वानुमानों के बीच घरेलू मांग भी लगातार मजबूत हो रही है.
बजट में रिस्क कम करना
नई दिल्ली की रणनीति केवल टैरिफ के दर्द से बचने के बारे में नहीं है, बल्कि इसे संरचनात्मक लाभ में बदलने के बारे में है. इसका मुख्य आधार स्रोतों में विविधता लाना और सिंगल सप्लायर्स पर निर्भरता कम करना है. इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं. ऐतिहासिक रूप से कच्चे तेल और कोयले के लिए आपूर्तिकर्ताओं केी संख्या पहले 30 से कम थी, जिसे बढ़ाकर 40 कर दिया गया है.
खट्टर ने मीडिया रिपोर्ट में कहा कि मेक इन इंडिया सेक्टर्स जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर, रिन्युएबज एनर्जी और इलेक्ट्रिक वाहन, विशेष रसायन और रक्षा को प्राथमिकता देते हुए, टैरिफ रिफॉर्म उपायों और इनपुट पर एंट्री लेवल की छूट में बदलाव की उम्मीद की जा सकती है.
साथ ही, उभरते घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को संरक्षित करने और लोकल वैल्यू एडिशन को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार तैयार इलेक्ट्रॉनिक्स, यात्री इलेक्ट्रिक वाहनों और घरेलू उपकरणों तथा चुनिंदा उपभोक्ता-उन्मुख रसायनों पर हाई टैरिफ को यथावत रख सकती है. यह सरकार की लंबे समय से चल रही पीएलआई योजनाओं के अनुरूप है, जिन्हें आयात और घरेलू उत्पादन के बीच के अंतर को पाटने के लिए डिज़ाइन किया गया है. इलेक्ट्रॉनिक्स इसका एक प्रमुख उदाहरण है: पीएलआई प्रोत्साहनों के समर्थन से, भारत दुनिया के शीर्ष स्मार्टफोन निर्माताओं में से एक के रूप में उभरा है, जिसमें एप्पल और डिक्सन टेक्नोलॉजीज जैसी कंपनियां उत्पादन का विस्तार कर रही हैं.
बजट से रणनीतिक आयात के द्वार खुलेंगे
विरोधाभासी रूप से, जहां एक ओर ट्रंप द्वारा लागू टैरिफ सुरक्षा उपायों में वृद्धि हो रही है, वहीं भारत चुनिंदा रूप से उन सेक्टर्स में बाधाओं को कम कर रहा है, जहां सप्लाई चेन को मजबूत करने का तर्क प्रबल है. नई दिल्ली के नीतिगत हलकों का तर्क है कि सभी विदेशी प्रतिस्पर्धा को रोकना केवल अक्षमताओं को ही बरकरार रखेगा. इसके बजाय, सुनियोजित खुलापन – विशेष रूप से एडवांस मशीनरी, स्पेसिफिक कंपोनेंट्स और कैपिटल गुड्स में – भारतीय कंपनियों को कॉस्ट कंट्रोल करने, तेजी से इनोवेशन करने और ग्लोबल वैल्यू चेन में गहराई से इंटीग्रेट होने में मदद कर सकता है.
खट्टर ने कहा कि बजट-प्रेरित टैरिफ परिवर्तन वैकल्पिक सप्लायर्स को प्रोत्साहित करके और स्थानीय क्षमता का निर्माण करके चीन से धीरे-धीरे विविधीकरण का समर्थन कर सकते हैं, हालांकि निकट भविष्य में कुछ व्यापार अभी भी तीसरे देशों के माध्यम से रीडायरेक्ट किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, भारत की वार्ता और व्यापार समझौते, जैसे कि भारत-ईएफटीए व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौता जो जल्द ही लागू होने वाला है, भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के राज्यों के बीच अधिकांश वस्तुओं पर शुल्क कम कर देगा.
बजट नए ट्रेड रूट को कैसे कर सकता है सपोर्ट?
जिस प्रकार नई दिल्ली इंपोर्ट सोसेस में विविधता लाने का प्रयास कर रही है, उसी प्रकार उसने एक्सपोर्ट मार्केट में विविधता लाने के प्रयासों को भी तेज कर दिया है. अमेरिकी शुल्कों के कारण ट्रेडिशनल एक्सपोर्ट रूट्स पर दबाव बढ़ रहा है, ऐसे में भारतीय निर्यातक यूरोपीय यूनियन, मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया के बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं. स्पेन, संयुक्त अरब अमीरात, चीन और बांग्लादेश जैसे देशों ने लगातार निर्यात वृद्धि दर्ज की है, जो विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में अधिक संतुलित भागीदारी को दर्शाती है.
यह केवल भौगोलिक स्थिति की बात नहीं है, बल्कि उत्पाद मिश्रण की भी बात है. इलेक्ट्रॉनिक्स और हाई टेक प्रोडक्ट्स को पारंपरिक श्रम-प्रधान निर्यातों की तुलना में अधिक महत्व मिल रहा है, जिससे हाई वैल्यू एडेड सामग्री के साथ एक मजबूत व्यापार संरचना का निर्माण हो रहा है.
इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उच्च निर्भरता वाले सेक्टर्स में, तैयार माल पर हाई टैरिफ और स्टैंडर्ड/टेस्टिंग और लाइसेंसिंग प्रोसेसिंग जैसे शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं का उद्देश्य घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना और लोअर क्वालिटी वाले इंपोर्ट पर अंकुश लगाना है. खट्टर ने कहा कि ये लचीले घरेलू इकोसिस्टम के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अल्पावधि में ये सबसे सस्ते वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं तक पहुंच को भी सीमित कर सकते हैं, खासकर जहां घरेलू क्षमताएं अभी भी विकसित हो रही हैं.



