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क्या परिसीमन में गैरिमैंडरिंग करना चाहती थी BJP? लोकतंत्र के लिए क्यों है खतरनाक?

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संविधान में 131वां संशोधन विधेयक जो कि संसद में महिला को आरक्षण के तहत मिलने वाली सीटों और परिसीमन को साथ में मिलाकर लाया गया था वह पास नहीं हो सका। यह असफलता सरकार और भाजपा दोनों के लिए बड़ा झटका साबित हुई है।

यह सिर्फ एक बिल की हार नहीं, बल्कि एकजुट विपक्ष की ताकत का संकेत भी है। इस घटनाक्रम ने देश में संविधान, लोकतंत्र और सत्ता संतुलन पर एक नई बहस शुरू कर दी है। पिछले 2-3 हफ्तों में संसद और राजनीतिक गलियारों में यही मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। साथ ही सरकार पर गैरिमैंडरिंग के आरोप लग रहे हैं। ऐसे में ये जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि आखिर

Gerrymandering (गैरिमैंडरिंग) क्या है और इसका इतिहास क्या है?

गैरिमैंडरिंग का मतलब क्या है?

गैरिमैंडरिंग का मतलब है चुनावी क्षेत्रों (constituencies) की सीमाओं को इस तरह बदलना कि किसी एक राजनीतिक पार्टी या समूह को बिना ईमानदारी के (Unfair) फायदा मिल जाए। आम तौर पर वोटर नेता चुनते हैं, लेकिन गैरिमैंडरिंग में नेता ही अपनी पसंद के वोटर चुन लेते हैं। ये किसी इलाके की सीमाएं बदलकर या फिर उस इलाके को अलग-अलग हिस्सों तोड़कर/बांटकर वहां रहने वाले वोटर्स के असर को कमजोर किया जाता है।

यह कैसे काम करता है?

  • चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को इस तरह बदला जाता है कि कुछ खास वोटर्स एक जगह इकट्ठा हों या अलग-अलग बांट दिए जाएं।
  • मकसद होता है कि बिना ज्यादा वोट पाए भी ज्यादा सीटें जीती जा सकें।

Common तरीके:

  1. Cracking (क्रैकिंग): विपक्ष के वोटर्स को अलग-अलग क्षेत्रों में बांट दिया जाता है। इससे वे हर जगह थोड़ा-थोड़ा हारते रहते हैं।
  1. Packing (पैकिंग): विपक्ष के वोटर्स को एक ही क्षेत्र में ज्यादा संख्या में इकट्ठा कर दिया जाता है। इससे वे एक-दो सीट तो बड़े अंतर से जीतते हैं, लेकिन बाकी जगह हार जाते हैं।

आसान भाषा में समझें

तोड़कर- मान लीजिए, दिल्ली, गुरुग्राम और नोएडा में एक-एक हजार वोटर्स रहते हैं। जिसमें से दिल्ली के वोटर्स पार्टी-A और नोएडा व गुरुग्राम के वोटर्स पार्टी-B के वोटर्स माने जाते हैं। गैरिमैंडरिंग फोर्मूले के तहत अगर दिल्ली को आधा नोएडा और आधा गुरुग्राम में मिला दिया जाए तो फिर पार्टी-A को वोटर्स का असर 500-500 के दो हिस्सों में बंटकर काफी कम हो जाएगा, क्योंकि तब गुरुग्राम और नोएडा में पार्टी-B के 1000-1000 वोटर्स हो जाएंगे। जिसका फायदा पार्टी-B को मिलेगा।

जोड़कर- इस परिस्थिति में मान लीजिए कि दिल्ली, गुरुग्राम और नोएडा तीनों में ही दोनों पार्टियों के 500-500 वोटर्स हैं। ऐसे में तीनों सीटें फंस सकती हैं। तो इस सिचुएशन में गैरिमैंडरिंग के पैकेजिंग फोर्मूले के तहत गुरुग्राम और नोएडा के उन हिस्सों को दिल्ली में मिला दिया जाएगा जिनमें बड़ी संख्या में पार्टी-A के वोटर्स रहते हों। इससे दिल्ली में तो पार्टी-A बड़े अंतर से जीत जाएगी। लेकिन नोएडा और गुरुग्राम की दो सीटें आसानी से हार भी जाएगी।

यह क्यों गलत माना जाता है?

  • लोकतंत्र में सही प्रतिनिधित्व बिगड़ जाता है
  • चुनावों में मुकाबला कम हो जाता है
  • वोटर्स का असली असर कम हो जाता है

भारत में क्या है स्थिति?

भारत में इस तरह की सीधी गैरिमैंडरिंग कम होती है क्योंकि यहां सीमाएं तय करने का काम Delimitation Commission of India करता है और सरकार सीधे तौर पर सीमाएं नहीं बदलती (जैसे अमेरिका में होता है)

फिर भी बहस क्यों होती है?

दरअसल भारतीय संविधान में परिसीमन (delimitation) जनसंख्या के आधार पर किए जाने का नियम है। और जनसंख्या के आधार पर ही सीटों का बंटवारा हो सकता है। अगर ये नियम पास हो जाता तो उसका असर उत्तर भारत vs दक्षिण भारत की राजनीतिक पर असर एक समान न होकर अलग-अलग पड़ता।

क्या गैरिमैंडरिंग लोकतंत्र को कमजोर कर सकती है?

हां, गैरिमैंडरिंग लोकतंत्र को कमजोर कर सकती है, क्योंकि इससे चुनाव निष्पक्ष नहीं रहते और असली जनमत सही तरीके से सामने नहीं आता। जो जनमत सामने आता उसमें जनता नेता को नहीं बल्कि एक तरह से नेता जनता को चुनते।

कहां से आया “Gerrymandering” शब्द?

1812 में, अमेरिका के मैसाचुसेट्स राज्य में Democratic-Republican Party सत्ता में थी। अपनी ताकत बनाए रखने के लिए इस पार्टी ने राज्य के सीनेट चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं को अपने फायदे के हिसाब बदल दिया। उस समय के गवर्नर Elbridge Gerry ने इस बिल पर साइन करके इसे कानून बना दिया। एल्ब्रिज गेरी अमेरिका के संस्थापक नेताओं में से एक थे, उन्होंने United States Declaration of Independence पर भी हस्ताक्षर किए थे और बाद में अमेरिका के पांचवें उपराष्ट्रपति भी बने। यहीं से “Gerrymandering” शब्द की शुरुआत हुई, जो उनके नाम “Gerry” से लिया गया है।